दैनिक यूपी ब्यूरो
13/10/2021  :  13:32 HH:MM
अयोध्या गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड: नवम गुरु तेगबहादुर ने यहां किया था 48 घंटे का अखंड तप
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रामनगरी अयोध्या स्थित गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड सिख परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां अगहन शुक्ल पंचमी के अवसर पर यानी गुरु तेगबहादुर के बलिदान दिवस पर प्रतिवर्ष गुरुग्रंथ साहब का शताधिक पाठ होता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है। यह गुरुद्वारा ऐतिहासिक है। सन् 1500 में सिखों के प्रथम गुरु नानकदेव हरिद्वार से जगन्नाथपुरी जाते हुए रामनगरी पहुंचे थे और सरयू तट स्थित ब्रह्मा जी के तपस्थान पर धूनी रमाकर कुछ समय व्यतीत किया, कालांतर में उसी जगह यह गुरुद्वारा विकसित हुआ। सन् 1668 में आसाम से आनंदपुर जाते हुए नवम गुरु तेगबहादुर भी इस स्थल पर आए और 48 घंटे तक अखंड तप किया। जाते समय यहां के ब्राह्मण सेवक को यादगार स्वरूप वे अपनी खड़ाऊं भेंट कर गए। यह खड़ाऊं आज भी गुरुद्वारा में संरक्षित है।

अयोध्या,(दैनिक यूपी ब्यूरो)। रामनगरी अयोध्या स्थित गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड सिख परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां अगहन शुक्ल पंचमी के अवसर पर यानी गुरु तेगबहादुर के बलिदान दिवस पर प्रतिवर्ष गुरुग्रंथ साहब का शताधिक पाठ होता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है। यह गुरुद्वारा ऐतिहासिक है। सन् 1500 में सिखों के प्रथम गुरु नानकदेव हरिद्वार से जगन्नाथपुरी जाते हुए रामनगरी पहुंचे थे और सरयू तट स्थित ब्रह्मा जी के तपस्थान पर धूनी रमाकर कुछ समय व्यतीत किया, कालांतर में उसी जगह यह गुरुद्वारा विकसित हुआ। सन् 1668 में आसाम से आनंदपुर जाते हुए नवम गुरु तेगबहादुर भी इस स्थल पर आए और 48 घंटे तक अखंड तप किया। जाते समय यहां के ब्राह्मण सेवक को यादगार स्वरूप वे अपनी खड़ाऊं भेंट कर गए। यह खड़ाऊं आज भी गुरुद्वारा में संरक्षित है।

करीब चार साल बाद यानी सन् 1672 में पटना से आनंदपुर साहब जाते समय दशम गुरु गोविंद सिंह बाल्यावस्था में अपनी मां गुजरीदेवी एवं मामा कृपाल सिंह के साथ यहां आए। इसके बाद एक सदी से अधिक तक यह स्थल गुमनामी का शिकार रहा। सन् 1785 में बाबा गुलाब सिंह ने इस ऐतिहासिक स्थल को प्रतिष्ठित किया और निशान साहब की स्थापना की। सन् 1846 में उनके उत्तराधिकारी बाबा शत्रुजीत सिंह ने गुरुद्वारा का निर्माण कराया। इसी के साथ ही सिख परंपरा के अनुरूप आयोजनों की श्रृंखला भी शुरू हुई। विशेष रूप से जिन तीन गुरुओं के यहां चरण पड़े थे, उनके प्रकाश पर्व पर विशेष आयोजन होते रहे।

साल 1919 में तीसरे महंत जसवंत सिंह के समय गुरुद्वारा का रजिस्ट्रेशन कराया गया। स्थानीय सिख श्रद्धालुओं की सुविधा के अनुसार अगहन शुक्ल पंचमी को गुरुद्वारा में नवम गुरु का बलिदान दिवस सालाना जलसे के रूप में मनाया जाने लगा। तभी से यहां अनिवार्य रूप से गुरु ग्रंथ साहब के अखंड पाठ की परंपरा शुरू हुई। यह परंपरा ग्रंथ साहब के अखंड पाठ की लड़ी के रूप में समृद्ध होती गई। लड़ी का क्रम शुरू में एक से पांच पाठ तक पहुंचा। कालांतर में लड़ी में अखंड पाठ की संख्या 11, 21, 51, 81 तक पहुंची और सवा दशक पूर्व लड़ी में शताधिक अखंड पाठ शामिल हुआ। इस वर्ष यह संख्या 121 पाठ तक जा पहुंची। पाठ में बाहर के नौ रागी और चार स्थानीय रागी शामिल हैं।

आस्था ही नहीं विशालता की दृष्टि से भी महनीय: गुरु ग्रंथ साहब आस्था और पवित्रता की वजह से महनीय होने के साथ अत्यंत विशद भी हैं। ग्रंथ साहब में 1430 पृष्ठ, पांच हजार 894 पद और 10 लाख 24 हजार अक्षर हैं। इस ग्रंथ का एक बार पारायण ही भक्तों की परीक्षा लेता है और ऐसे में प्रति वर्ष शताधिक बार पारायण से इस ग्रंथ के प्रति समर्पण का अनुमान लगाया जा सकता है।

संरक्षित है गुरु अर्जुनदेव के समय की हस्तलिखित प्रति: जिस गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में प्रति वर्ष गुरुग्रंथ साहब का शताधिक पारायण होता है, वहां गुरु ग्रंथ साहब की हस्तलिखित प्रति भी संरक्षित है। गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड के मुख्यग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह के अनुसार यह प्रति पांचवें गुरु अर्जुनदेव के आदेश पर भाई दौलत सिंह ने लिखी थी।

छह गुरुओं एवं 15 भक्तों की वाणी: गुरु ग्रंथ साहब में गुरु नानकदेव, गुरु अंगददेव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुनदेव एवं नवम गुरु तेगबहादुर सहित रविदास, जयदेव, रामाजी, त्रिलोचन, रहीम, फरीद, कबीर, गोस्वामी तुलसीदास जैसे 15 भक्तों की वाणी भी संकलित है।






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