दैनिक यूपी ब्यूरो
16/07/2021  :  21:51 HH:MM
दिल्ली पुलिस के वकीलों के पैनल को केजरीवाल मंत्रिमंडल ने किया खारिज
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देश के किसान का साथ देना हर भारतीय का फ़र्ज़ है, हमने कोई एहसान नहीं किया, देश के किसान के प्रति अपना फ़र्ज़ निभाया है, किसान अपराधी नहीं है, आतंकवादी नहीं है, वो हमारा अन्नदाता है: अरविंद केजरीवाल

नई दिल्ली, (दैनिक यूपी ब्यूरो)। केंद्र सरकार के दबाव के बावजूद केजरीवाल मंत्रिमंडल ने दिल्ली पुलिस के वकीलों के पैनल को खारिज कर दिया है। इस आशय का फैसला शुक्रवार को दिल्ली सचिवालय  में आयोजित कैबिनेट की बैठक में लिया गया। बैठक की मुख्यमंत्री अध्यक्षता अरविंद केजरीवाल ने की। बैठक के बाद केजरीवाल ने कहा कि देश के किसान का साथ देना हर भारतीय का फ़र्ज़ है। हमने कोई एहसान नहीं किया। देश के किसान के प्रति अपना फ़र्ज़ निभाया है। किसान अपराधी नहीं है, आतंकवादी नहीं है, वो हमारा अन्नदाता है। लिहाजा, दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने फ़ैसला किया है कि दिल्ली सरकार के वकील ही किसान आंदोलन से जुड़े मामलों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर होंगे। 

मंत्रिमंडल की बैठक में एक और बड़ा फैसला किया गया जिसके तहत केंद्र सरकार के वकीलों को उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में पेश होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया है। दिल्ली कैबिनेट का कहना है कि अभियोजन और जांच एजेंसी के बीच स्वतंत्रता हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली का आधार है, जैसा कि सर्वाेच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के कई निर्णयों द्वारा स्थापित किया गया है। उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के निर्णयों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एलजी अनुच्छेद 239 एए (4) को केवल ‘अत्यंत दुर्लभ मामलों’ में लागू कर सकते हैं। विशेष लोक अभियोजकों की बार-बार नियुक्तियां इस श्रेणी में नहीं आ सकती है। जांच एजेंसी और अभियोजक सेवा के बीच भेद बनाए रखना जरूरी है। दिल्ली पुलिस के वकीलों को किसानों के खिलाफ मामलों में लड़ने नहीं दे सकते। दिल्ली सरकार चाहती है कि सरकारी वकीलों का मौजूदा पैनल किसानों के विरोध में दर्ज मामलों और दिल्ली दंगों के मामलों में पेश हों। सीएम केजरीवाल के नेतृत्व में कैबिनेट द्वारा लिए गए दोनों फैसले एलजी को भेजे जाएंगे।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार की तरफ से बनाए गए तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले कई माह से दिल्ली के बाँर्डर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने आंदोलन कर रहे किसानों के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं।  किसानों पर दर्ज मामलों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए दिल्ली सरकार ने सरकारी वकीलों का पैनल बनाया है।  

वहीं, दूसरी तरफ इस मामले की जांच कर रही दिल्ली पुलिस ने अपने वकीलों का पैनल नियुक्त करवाना चाहती है। दिल्ली पुलिस ने वकीलों का एक पैनल बनाकर अनुमोदन के लिए लिस्ट दिल्ली के गृहमंत्री सत्येंद्र जैन को भेजी थी। दिल्ली पुलिस की ओर से भेजी गई वकीलों की सूची को जांचने के बाद सत्येंद्र जैन ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद, सरकारी वकीलों का पैनल बनाकर दिल्ली के गृहमंत्री ने उसका प्रस्ताव उप राज्यपाल के पास भेजा था, जिसको एलजी ने मंजूरी नहीं दी। उप राज्यपाल ने दिल्ली सरकार से कहा कि दिल्ली पुलिस के वकीलों के पैनल को कैबिनेट मंजूरी दें, जिसके बाद केजरीवाल सरकार ने आज कैबिनेट की बैठक बुलाई थी। 

दिल्ली सरकार के वकीलों की हो चुकी तारीफ

दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली के गृहमंत्री के बीच कुछ दिनों पहले एक वर्चुअल बैठक हुई थी। जिसमें उपराज्यपाल यह स्वीकारा किए थे कि दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त किए गए पब्लिक प्रॉसिक्यूटर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और बहुत काबिल हैं। दिल्ली सरकार के वकील अच्छे से केस लड़ रहे हैं। दिल्ली सरकार के वकीलों के खिलाफ कोई शिकायत भी नहीं है।

दिल्ली कैबिनेट के किसान आंदोलन के मामले में इसलिए खारिज किया एलजी का प्रस्ताव

1- 04 जुलाई 2018 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि अनुच्छेद 239एए (4) के नियम को एलजी द्वारा अत्यंत दुर्लभ मामलों में लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर एलजी नियमित रूप से लागू करना शुरू करते हैं, तो कोई लोकतंत्र नहीं बचेगा और एलजी व्यावहारिक रूप से लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के बहिष्कार के लिए सरकार चलाएंगे। विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति और वह भी बार-बार अत्यंत दुर्लभ मामलों की श्रेणी में नहीं आती है। कैबिनेट को लगता है कि इस मामले में उपरोक्त नियम को लागू करने के लिए एलजी का निर्णय गलत है। कैबिनेट ने एलजी से अनुरोध किया है कि वे इन मामलों में दिल्ली पुलिस द्वारा अनुशंसित वकीलों को विशेष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने के नियम लागू करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करें।

2- उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार सीआरपीसी के तहत लोक अभियोजक की भूमिका पुलिस बल के प्रवक्ता के रूप में कार्य करने की नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र वैधानिक भूमिका का निर्वहन करने के लिए है, जो कोर्ट में सही तस्वीर पेश करता है।

3-  इसलिए, स्वतंत्र वकीलों की नियुक्ति करना महत्वपूर्ण है और दिल्ली पुलिस द्वारा अनुशंसित वकीलों के नाम स्वीकार नहीं किए जा सकते हैं।

4- इन मामलों में भाग लेने वाले नियमित पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अच्छा काम कर रहे हैं। यहां तक कि दिल्ली पुलिस के पास भी उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं है और न ही दिल्ली पुलिस ने उन्हें बदलने का कोई कारण बताया है। एलजी को भी नियमित पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के खिलाफ कोई शिकायत नहीं मिली है। चूंकि एलजी इस बात पर बल दे रहे हैं कि सहकारी संघवाद और सहयोग की भावना से हम दिल्ली पुलिस द्वारा अनुशंसित मामलों के अलावा इन मामलों में अच्छे वरिष्ठ वकीलों को विशेष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में नियुक्त कर सकते हैं, लेकिन पब्लिक प्रॉसिक्यूटर स्वतंत्र होने चाहिए। इसलिए दिल्ली पुलिस की पसंद के अनुसार नियुक्त नहीं हो सकते हैं। यह जांच एजेंसी और अभियोजन सेवा के बीच अंतर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, जो कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली का आधार है।

दिल्ली दंगों में एलजी के प्रस्ताव को खारिज करने का कारण

1- अपने 4 जुलाई 2018 के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि अनुच्छेद 239एए (4) के प्रावधान को एलजी द्वारा अत्यंत दुर्लभ मामलों में लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यदि एलजी नियमित रूप से लागू करना शुरू कर देते हैं, तो कोई लोकतंत्र नहीं बचेगा और एलजी व्यावहारिक रूप से लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के बहिष्कार के लिए सरकार चलाएंगे। विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति और वह भी बार-बार, अत्यंत दुर्लभ मामलों की श्रेणी में नहीं आती है। कैबिनेट को लगता है कि एलजी का इस मामले में उपरोक्त प्रावधान को लागू करने का निर्णय गलत है। कैबिनेट ने एलजी से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।

2- दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ-साथ निचली अदालतों ने भी दिल्ली दंगों से संबंधित कई मामलों में दिल्ली पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जहां दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर एसपीपी नियुक्त किए गए थे। इस संबंध में हाल के दो उदाहरण इस प्रकार हैं-

पहला- देवांगना कलिता बनाम दिल्ली पुलिस डब्ल्यू.पी. (सीआरएल) 898/2020 आदेश दिनांक 27.07.2020 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने निम्नानुसार आयोजित किया-

जानकारी के चुनिंदा प्रकटीकरण की गणना जनता की राय को यह मानने के लिए करती है कि एक आरोपी कथित अपराध का दोषी है; संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा या विश्वसनीयता को धूमिल करने के लिए अभियान चलाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक या अन्य मीडिया का उपयोग करना और मामलों को सुलझाने व जांच के शुरुआती चरण में दोषी को पकड़ने के संदिग्ध दावे करने के लिए, स्पष्ट रूप से अनुमति नहीं होगी। ऐसा केवल इसलिए नहीं है, क्योंकि इस तरह की कार्रवाइयां निष्पक्ष सुनवाई को न सिर्फ प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती हैं, बल्कि इसलिए भी कि यह कुछ मामलों में उस व्यक्ति की गरिमा को छीनने या अपमान के अधीन करने का प्रभाव हो सकता है।

दूसरा- राज्य बनाम मो. नासिर सीआरएल पुनरीक्षण संख्या 23/2020 अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने दिनांक 14.07.2021 के आदेश में निम्नानुसार आयोजित किया

ललिता कुमारी (सुप्रा) के मामले में संविधान पीठ के शासनादेश की इस मामले में स्पष्ट रूप से अनदेखी की गई है और इससे स्पष्ट है कि प्रतिवादी की शिकायत में नामजद आरोपी व्यक्तियों के लिए पुलिस द्वारा बचाव की मांग की है। यहां तक कि नामजद आरोपी नरेश गौड़ के खिलाफ भी कोई जांच नहीं हुई है। प्रतिवादी दिनांक 03.07.2020 की बाद की शिकायत पर अलग से कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है, जिसमें उन्होंने अपनी पूर्व शिकायत में नामित व्यक्तियों द्वारा उनके जीवन को दी जा रही धमकियों के बारे में स्पष्ट रूप से कहा था।

3- उपरोक्त केवल उदाहरण मात्र हैं। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि उन मामलों में दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर नियुक्त एसपीपी पुलिस से स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाए हैं, जो भारतीय संविधान के तहत आपराधिक न्याय प्रणाली की आधारशिला है। सीआरपीसी के तहत, जैसा कि सर्वाेच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों द्वारा आयोजित किया गया है, लोक अभियोजक की भूमिका पुलिस बल के प्रवक्ता के रूप में कार्य करना नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र वैधानिक भूमिका का निर्वहन करना है, जो न्यायालय में सही तस्वीर पेश करता है।

4- चूंकि एलजी इस बात पर बल दे रहे हैं कि सहकारी संघवाद और सहयोग की भावना से हम दिल्ली पुलिस द्वारा अनुशंसित मामलों के अलावा इन मामलों में अच्छे वरिष्ठ वकीलों को विशेष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में नियुक्त कर सकते हैं, लेकिन पब्लिक प्रॉसिक्यूटर स्वतंत्र होने चाहिए। इसलिए दिल्ली पुलिस की पसंद के अनुसार नियुक्त नहीं हो सकते हैं। यह जांच एजेंसी और अभियोजन सेवा के बीच अंतर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, जो कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली का आधार है।






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