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दैनिक यूपी ब्यूरो
31/10/2016  :  00:45 HH:MM
मां तुझे सलाम
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दीपावली वीर सेनानियों के नाम है तो साथ में उन माँओं के नाम भी होना चाहिए जो इन वीर सपूतों को जन्म देती है। पालती है,पोसती है। रात भर जागकर बच्चे को सुख की नींद सुलाती है।

माँ तुझे सलाम।
Anjana Parashar
माँ तुझे सलाम।
ये दीपावली वीर सेनानियों के नाम है तो साथ में उन माँओं के नाम भी होना चाहिए जो इन वीर सपूतों को जन्म देती है। पालती है,पोसती है। रात भर जागकर बच्चे को सुख की नींद सुलाती है। 
सचमुच माँ जीवन का दूसरा नाम है। माँ बिन सब कुछ सूना। माँ हमारी ताकत। माँ हमारी कमजोरी भी। माँ के बिना दुनिया ही अधूरी लगती है। 
अपने आँचल में छिपाकर,दुनिया के सारे गम भुलाकर बस मेरी चिंता। चोट लगी तो मानों उसका सीना चोटिल हो गया। दर्द मुझे हो, कराह उसके मन में उठे। उससे अच्छा दोस्त भला कौन हो सकता है? मेरे मन की हर बात पल भर में समझ जाती है। माँ की ताकत जो नहीं समझ पाया वो जीवन की मझधार में उलझकर रह जाता है।
दीपावली के ठीक पहले धोनी,विराट सहित पूरी टीम जब मैदान में उतरी तो सबकी टी शर्ट पर माँ का नाम उकेरा गया था। मानों सबकी पीठ पर माँ अपना हाथ फेर रही थी। कह रही थी,उठो, जागो मेरे शेरों। बता दो कि तुमने माँ का दूध पिया है। धोनी के धुरंधरों ने निराश भी नहीं किया। जिसके पीठ पर माँ का हाथ हो वो भला हार कैसे सकता है। ताकत दूनी हो जाती है। न्यूज़ीलैंड को पस्त कर दीपावली का शानदार उपहार टीम इंडिया ने पूरे देश के साथ अपनी माँओं को दिया। ये एक नजीर भी है। पुरुष प्रधान समाज बदल रहा है। या बदलाव को मजबूर हो रहा है। जो भी है। ये तश्वीरें सुखद हैं । मन को संतोष देती हैं।
टीम धोनी ने जो उदहारण पेश किया है उसे अन्य जगहों पर लागू करना चाहिए। मातृसत्ता की अहमियत हर संस्थान महसूस करे। वैसे काफी बदलाव आया भी है। माँ का नाम हर जगह लिखा जाने लगा है। राशन कार्ड पर तो माँ के नाम को ही परिवार के मुखिया के रूप में दर्ज करने का एलान यूपीए सरकार में हो गया था। 
लेकिन अब नाम से आगे जिम्मेदारी देने का काम होना चाहिये। पंचायतों में महिलाएं नाममात्र की सरपंच न रहें। संसद,विधानसभाओं में पुरुष प्रभुत्व को समाप्त करने के लिए आरक्षण सुनिश्चित हो। घरेलू हिंसा का शिकार महिलाएं न बनें। उन्हें ज्यादा हक़ नहीं चाहिए लेकिन बराबरी का हक़ जरूर चाहिए। शराब पीकर महिलाओं पर नशा उतारने वालों का असली इलाज यही हो सकता है कि उनकी नकेल महिलाओं के हाथ में हो।
माँ,बेटियों,बहनों की प्रतिष्ठा को लेकर जो समाज सचेत होगा वहां की प्रगति की कहानी औरों से मीलों आगे होगी। बड़ा अफ़सोस होता है जब सुनने को मिलता है कि कोई औरत बेचारी बन गई। भला कैसे हो सकता है। जो जन्मदायिनी है। जो जीवनदायिनी है। वो इस तरह से कमजोर कैसे हो सकती है कि कोई उसे दया या रहम के लायक बना दे। शारीरिक बनावट का फायदा उठाकर महिलाओं को अबला बताना शर्मनाक है। ये नहीं चल सकता। महिलाएं इस धारणा को नकार भी रही हैं। हर छेत्र में उन्होंने अपने को साबित किया है। अब वे जन्म देने लालन पालन के साथ वो भूमिकाएं भी निभा रही हैं जिनके बूते पुरुष सबकुछ अपने कब्जे में करने की चाहत पालता रहा है।
हमारे देश में पूर्वोत्तर के कुछ राज्य मातृसत्तात्मक समाज के प्रतीक हैं। वहां शादी के बाद लड़की लड़के के घर नहीं जाती। कई जगहों पर पति की तनख्वाह लेने महिलाएं जाती हैं। सोचिये ये अगर पूरे देश में हो जाए तो कितना बड़ा बदलाव आएगा। सरकार विचार तो करे घर ही नहीं देश भी संभल जायेगा। प्रगति की रफ़्तार दूनी हो जायेगी। अर्थव्यवस्था का ढांचा बदल जाएगा। 
खैर ये न भी हो तो बहुत कुछ ऐसा है जो हो सकता है। आसानी से हो सकता है। लड़की या महिला किसी भी भूमिका में हो उसे सम्मान मिले। उनकी आर्थिक भागीदारी में समतामूलक प्रावधान हों  घरों में महिलाओं का शोषण बंद करने के लिए सारे बैंक खातों को महिलाओं के साथ साझा किया जाये। ये आइडियाज हैं। आप और हम मिलकर सोचें क्या हो सकता है। यही मातृसत्ता की पूजा है। माँ लक्ष्मी की कृपा आप सब पर बनी रहे। माँ तुझे सलाम।
महिला शक्ति की बेहतरी के लिए अपना समर्थन और सुझाव ईमेल anjanaparashar2011@gmail.c om पर भेज सकते हैं 
जय हिंद 






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