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दैनिक यूपी ब्यूरो
27/10/2016  :  13:07 HH:MM
शोषण से मिलेगी आज़ादी
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तलाक तलाक तलाक और जिंदगी खत्म। भला कैसे? अर्से से हो रहा है इसलिए चलने दो। न तो धर्म इसे मान्यता देता है न समाज में इस मान्यता से भलाई का रास्ता खुलता है। फिर भी चलने दो। क्यों? क्योंकि हमारे चंद मौलवी साहब इसे धार्मिक चोला पहनाये हुए हैं। ये बिल्कुल वैसा है जैसे अर्से तक सती प्रथा चलती रही। जब समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई तो जबरदस्त विरोध हुआ। लेकिन जीत अंततः सत्य की हुई। ये कुप्रथा अपराध के दायरे में आ गई। बाल विवाह अभी भी किसी कोने में होते होंगे लेकिन कानूनन अपराध बनाने के बाद अब ये भी आम नहीं रहा। न जाने कितने बचपन उजड़ने से बच गए।

जरूर पढ़ें।
शोषण से मिलेगी आजादी
अंजना पाराशर
तलाक तलाक तलाक और जिंदगी खत्म। भला कैसे? अर्से से हो रहा है इसलिए चलने दो। न तो धर्म इसे मान्यता देता है न समाज में इस मान्यता से भलाई का रास्ता खुलता है। फिर भी चलने दो। क्यों? क्योंकि हमारे चंद मौलवी साहब इसे धार्मिक चोला पहनाये हुए हैं। ये बिल्कुल वैसा है जैसे अर्से तक सती प्रथा चलती रही। जब समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई तो जबरदस्त विरोध हुआ। लेकिन जीत अंततः सत्य की हुई। ये कुप्रथा अपराध के दायरे में आ गई। बाल विवाह अभी भी किसी कोने में होते होंगे लेकिन कानूनन अपराध बनाने के बाद अब ये भी आम नहीं रहा। न जाने कितने बचपन उजड़ने से बच गए। याद कर लीजिये कोई भी ऐसी कुप्रथा नहीं रही होगी जिसे हमारे तथाकथित पंडित,मौलवी और समाज के धार्मिक ठेकेदारों ने धर्म का लबादा न ओढा दिया हो। लेकिन इन कुप्रथाओं को समाप्त करने का बीड़ा उठाया गया। कोई न कोई राजा राम मोहन राय जैसा महापुरुष इसका बीड़ा उठाने को तैयार हुआ। हमारे समाज के भीतर से आवाज आई। सरकारें खड़ी हुईं और तश्वीर बदली।
आज फिर आवाज उठी है। सरकार ने पहल की है। तीन तलाक अमानवीय है। इसका इस्लाम से कोई सरोकार नहीं। मुस्लिम समाज के प्रतिष्ठित  लोगों ने भी माना है धर्म का आवरण लेकर तीन तलाक से लाखों जिंदगियां बर्बाद हो चुकी हैं। महिलाओं,लड़कियों के लिये इससे बड़ा अभिशाप क्या हो सकता है कि ऐसी मान्यताओं को क़ानून का संरक्षण मिले।
शादी के बंधन में बंधने के बाद कई बार ऐसा होता है जब आपस में नहीं बनती। विचारों का मेल नहीं होता। कई अन्य मसले हो सकते हैं। लेकिन क्या तीन तलाक के साथ ही सब कुछ ख़त्म हो जाना चाहिए।
 शादी जन्म जन्मांतर का बंधन है ऐसा नहीं मानने वालों को ये तो मानना पड़ेगा कि ये जीवन जीने का एक कॉन्ट्रैक्ट है। एक दो पक्षीय समझौता है। जिसे अकेले मनमाने तरीके से नहीं तोड़ा जा सकता। इसकी कानूनी समीक्षा का हक़ होना चाहिए। संपत्ति विभाजन का स्पष्ट कानूनी मापदंड होना चाहिए। जो समझौता तोडना चाहता है निश्चित रूप से उसे अधिक कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए। भरण पोषण,अगर बच्चे हैं तो उनके रहन सहन,जीवन यापन,अच्छी शिक्षा का अधिकार ऐसे सभी मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। अलग होने का अधिकार मन और शरीर से मिल भी जाए, जिम्मेदारियों से मुक्ति का अधिकार धर्म की आड़ में देने का मतलब आधी आबादी के लिए शोषण का दरवाजा खुला रखना है। 

सच तो ये है इसे किसी मजहब से नहीं जोड़ा जा सकता। किसी भी धर्म जाति या समुदाय में पुरुष प्रधान मानसिकता,या खास वर्ग या लिंग प्रभुत्व के आधार पर बनाई गई परम्पराएं शाश्वत,सनातन नहीं हो सकती। इन्हें बदलना ही चाहिए। महिलाओं को उनका हक मिले,बेटियां कोख में न मारी जाएँ,जन्म लेने के बाद उन्हें समान व्यवहार मिले,ससुराल में दहेज़ की भेंट न चढ़ें। इन तमाम उद्देश्य के लिए जो भी संघर्ष हो जो भी प्रयास हों सरकारी या गई सरकारी उसे हाथों हाथ लेने को तत्पर हो जाइये।
 न तो तीन तलाक से मुक्ति। न ही बिना तलाक के शोषण की आजादी। इसके लिए सरकार के साथ समाज के भीतर से भी आवाज उठनी चाहिए। ये संकल्प युवाओं को करना होगा। लड़कियों को भी करना होगा। शिक्षण संस्थाओं से आवाज उठनी चाहिए। धर्म गुरुओं को साथ देना होगा।
 आइये चल पड़ें। नई सदी की नई इबारत लिखने को। समता मूलक समाज बनाने को। महिलाओं बेटियों को बचाने को। हम अकेले भी चलेंगे तो कारवां जरूर बनेगा। सूरत बदलेगी। ये संकल्प देश का है।
जय हिंद।






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