दैनिक यूपी ब्यूरो
15/06/2016  :  17:03 HH:MM
ब्रज चौरासी कोस यात्रा में तीर्थ झाडी हनुमान में हनुमत भक्ति और कृष्णभक्ति की प्रवाहित हो रही है गंगा
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झाड़ी हनुमान में हनुमत भक्ति और कृष्णभक्ति की गंगा प्रवाहित हो रही है। गर्ग संहिता तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार जब नन्दबाबा और यशोदा मां वृद्ध हो गए


मथुरा
ब्रज चौरासी कोस यात्रा के महत्वपूर्ण तीर्थ झाड़ी हनुमान में हनुमत भक्ति और कृष्णभक्ति की गंगा प्रवाहित हो रही है। गर्ग संहिता तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार जब नन्दबाबा और यशोदा मां वृद्ध हो गए तो उन्होंने श्यामसुन्दर से उन्हें तीर्थों का दर्शन कराने को कहा था। नन्दबाबा और यशोदा मां की अधिक आयु को देखकर श्यामसुन्दर ने सभी तीर्थों को ब्रज में ही प्रकट कर दिया था। यह सभी तीर्थ ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा में चातुर्मास में रहते हैं तथा उसी समय ब्रज चैरासी कोस की यात्राओं का आयोजन किया जाता है । इस यात्रा में सात से लेकर दस हजार तक लोग एक साथ नंगे पैर पैदल ही ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के लिए किसी न किसी तीर्थ पर पड़ाव डाला जाता है। नौहझील की झाड़ी हनुमान ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। वर्तमान में झाड़ी हनुमान में जहां सामूहिक हनुमत पूजन अर्चन चल रहा है वहीं दोपहर में यहां पर श्रीमदभागवत की कथा की अमृत वर्षा होती है तथा सायंकाल रासलीला के माध्यम से श्यामाश्याम की लीलाओं का वंदन होता है।

          अपर जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार के अनुसार सात जून से शुरू हुए इस मेले के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मथुरा से छाता होकर कुछ विशेष बसें भी चलाई गई हैं। कुछ पुलिसकर्मी सादा कपड़ों में भी लगाए गए हैं। मनोकामना पूरी करने वाले मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर में वैसे तो हमेशा भक्तों का जमघट लगा रहता है पर शनिवार या मंगलवार के दिन तो मंदिर का विशाल प्रांगण भी भक्तों के लिए छोटा पड़ जाता है। इस पावन स्थल पर हनुमतलाल के प्राकट्येात्सव पर वर्तमान में भक्तों द्वारा इस स्थल पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है । यहां के स्वयं प्राकट्य विग्रह के बारे में यह मशहूर है कि जो भी यहां पर आता है निराश नही जाता है। इस विग्रह के प्राकट्य के बारे में पूछे जाने पर झाड़ी हनुमान मंदिर नौहझील के महंत त्यागी रामरतन दास ने बताया कि सम्वत् 1998 विक्रमी ज्येष्ठ शुक्ल दसवीं के दिन पैकोली परिवार के पयहारी जी के शिष्य परमानन्ददास एवं वनखंडी दास ने ब्रज चौरासी कोस की यात्रा के दौरान नौहझील से दो किलोमीटर दूर वर्तमान के झाड़ी हनुमान मंदिर के पास जब विश्राम किया तो परमानन्ददास को आभास हुआ कि उन्हें कोई आवाज दे रहा है। उन्होंने ध्यान लगाकर सुना तो आवाज आई परमानन्द मै यहां झाड़ी में मिट्टी की ठेकरी में नीचे विराजमान हूं। तुम मिट्टी हटाकर मेरा दर्शन करो एवं चोला चढ़ाकर प्रसाद वितरित करो तभी तुम्हारी ब्रज चैरासी कोस परिक्रमा पूरी होगी। उन्होंने बताया कि इसके बाद परमानन्ददास ने अन्य जमाती सन्तों के साथ मिट्टी की ठेकरी चिमटे द्वारा खोदना शुरू किया तो उन्हें एक दिव्य रोशनी एवं गेहुंए रंग की संगमरमर की प्रतिमा के दर्शन हुए। इसके बाद संतों द्वारा आसपास की झाड़ी काटकर एक बड़ा चबूतरा बनाया गया और इस विगृह को वहीं स्थापित कर दिया गया। रात्रि जागरण, संकीर्तन, भंडारा किया गया और फिर दोनों संत अपनी चौरासी कोस की परिक्रमा पूरी करने के लिए चल दिए। 






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