दैनिक यूपी ब्यूरो
14/01/2021  :  00:15 HH:MM
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत 30 दिन का नोटिस अब अनिवार्य नहीं
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने व्यवस्था दी है कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत प्रकाशित किया जाने वाला नोटिस अब अनिवार्य नहीं होगा। नोटिस का प्रकाशन वैकल्पिक होगा और यह जोड़ों के इच्छा पर निर्भर होगा। न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की एकल पीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर यह महत्वपूर्ण फैसला दिया।

लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने व्यवस्था दी है कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत प्रकाशित किया जाने वाला नोटिस अब अनिवार्य नहीं होगा। नोटिस का प्रकाशन वैकल्पिक होगा और यह जोड़ों के इच्छा पर निर्भर होगा। न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की एकल पीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर यह महत्वपूर्ण फैसला दिया। इस याचिका में पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी को ससुर उसके साथ नहीं रहने देना चाहते। इसलिए उसे बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं जबकि दोनों बालिग हैं और मर्जी से विवाह किया है। पत्नी के पिता की आपत्ति पति के दूसरे धर्म से होने के कारण है। न्यायालय के आदेश पर पत्नी को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। न्यायालय के पूछने पर उसने अपने पति के साथ जाने की इच्छा जताई। 
सुनवाई के दौरान उक्त युगल ने कहा कि वे स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करना चाहते थे लेकिन इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत विवाह के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने पर अनिवार्य नोटिस का प्रकाशन जरूरी होता है। उसके 30 दिन बाद ही उनके विवाह को मंजूरी मिलती, वह भी तब जब कोई व्यक्ति उनके विवाह पर आपत्ति न दाखिल करता।
न्यायालय ने इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की। न्यायालय ने पाया कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 5 के तहत नोटिस एक अनिवार्य प्रक्रिया है जिसे धारा 6 के तहत प्रकाशित किया जाता है। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार का प्रकाशन स्वतंत्रता व निजता के अधिकार पर अतिक्रमण है। साथ ही यह विवाह के मामले में राज्य व अन्य लोगों को हस्तक्षेप का भी अधिकार देता है।
न्यायालय ने इन टिप्पणियों के साथ पारित अपने निर्णय में कहा कि जो युगल स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करना चाहते हैं, वे धारा 5 के नोटिस के साथ ही एक लिखित अनुरोध मैरिज ऑफिसर को दे सकते हैं। इसमें वे बता सकते हैं कि धारा 6 के तहत नोटिस का प्रकाशन कराना चाहते हैं अथवा नहीं। न्यायालय ने कहा कि यदि युगल नोटिस का प्रकाशन करने का लिखित अनुरोध नहीं करता है तो प्रकाशन नहीं किया जाएगा।
संदेह होने पर मैरिज ऑफिसर को अधिकार
न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया है कि मैरिज ऑफिसर को यह अधिकार होगा कि वह पक्षकारों की पहचान, उम्र व उनकी वैध सहमति के बारे में जांच कर ले तथा यह भी जांच कर ले कि पक्षकार शादी करने के लिए सक्षम हैं अथवा नहीं। न्यायालय ने कहा कि संदेह होने पर वह यथोचित विवरण व प्रमाण मांग सकता है। न्यायालय ने निर्णय की प्रति मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश दिये हैं, साथ ही मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह निर्णय के बारे में प्रदेश के सभी मैरिज अफसरों तथा सम्बंधित अधिकारियों को जानकारी मुहैया कराएं।   






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