दैनिक यूपी ब्यूरो
02/10/2020  :  20:16 HH:MM
निर्भया से हाथरस तक बेटियों पर सत्ता का मिजाज न बदला
Total View  169

निर्भया के आठ साल बाद हाथरस की बेटी के लिए न्याय मांगा जा रहा है। लेकिन पुलिस प्रशासन, सत्ताधारी दल के प्रवक्ता और खुद सरकार रेप हुआ ही नही इस बात पर जोर देते हुए नाटकीयता के साथ बचाव के सारे तर्क गढ़ रहे हैं। रात के अंधेरे में बेटी का शव परिवार की अनुमति के बिना उपले और पेट्रोल से जला दिया गया। शर्मनाक और घृणित कार्रवाई के वक्त पुलिस का एक अफसर मुस्कराता रहा। लेकिन किसी अफसर पर कोई कार्रवाई नही एक एसआईटी बना दी।


अंजना शर्मा
वर्ष 2012 याद आता है। पूरे देश का उबाल याद आता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस वक्त पूरा देश दरिंदगी का शिकार हुई निर्भया के साथ खड़ा था। लोग सड़कों पर थे। कालेज स्टूडेंट, नौकरीपेशा युवा,लड़के लड़की, महिलाएं बुजुर्ग सब एक सुर से बोल रहे थे बस और नही। ऐसा संदेश जाए कि ये आखिरी हो। सत्ता सफाई दे रही थी। लोग कार्रवाई की मांग कर रहे थे। आखिरकार सत्ता के नुमाइंदों को जनभावनाओ के सामने नतमस्तक होना पड़ा। एम्स और सिंगापुर में इलाज के बाद भी निर्भया नही बची। लेकिन कागज पर  बहुत चीजें बदल गई। सबसे बड़ा बदलाव कानून में बदलाव को लेकर हुआ। रेप की परिभाषा को व्यापक बनाया गया। कड़े कानूनी प्रावधान किए गए। मृत्युदंड की व्यवस्था हुई। लोग शांत हो गए। लगा काफी कुछ बदल जायेगा। लेकिन निर्भया के दोषियों को फ़ास्ट ट्रैक दंड में भी आठ साल लग गए। तमाम कानूनी पेंच का फायदा आरोपी समय बिताने के लिए उठाते रहे। यही नही रेप की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ गईं। कोई शहर, जिला या राज्य नही है जहां रेप की जघन्य वारदात न हो रही हो। बेटियों का मान मर्दन आम बात है। उनकी गरिमा से खिलवाड़ तो बहुत ही सहज माना जाता है। न मानसिकता समाज की बदली न ही सत्ता का मिजाज बदला।
 सरकारें अपने अपने हिसाब से रेप की व्याख्या करती रहीं। हमारे यहां बेहतर का राग अनवरत चल रहा है। बहुत उबाल हुआ तो हैदराबाद के मॉडल भी देखने को मिला वह एक अलग त्रासदी है। यानी सिस्टम फेल हो जाये तो खुद को बचाने के लिए खुद ही कानून अपने हाथ मे ले लेता है।
अब निर्भया के आठ साल बाद हाथरस की बेटी के लिए न्याय मांगा जा रहा है। लेकिन पुलिस प्रशासन, सत्ताधारी दल के प्रवक्ता और खुद सरकार रेप हुआ ही नही इस बात पर जोर देते हुए नाटकीयता के साथ बचाव के सारे तर्क गढ़ रहे हैं। रात के अंधेरे में बेटी का शव परिवार की अनुमति के बिना उपले और पेट्रोल से जला दिया गया। शर्मनाक और घृणित कार्रवाई के वक्त पुलिस का एक अफसर मुस्कराता रहा। लेकिन किसी अफसर पर कोई कार्रवाई नही एक एसआईटी बना दी। बताया ये जा रहा है कि प्रशासनिक अछमता से मुख्यमंत्री गुस्से में हैं। प्रधानमंत्री ने बात करके मुख्यमंत्री को कठोर कार्रवाई का निर्देश दे दिया। सीएम का ट्वीट भी आ गया दोषियों को नही छोड़ेंगे समूल नाश होगा। अरे जो साफ दिख रहा है प्रशासन की क्रूरता पर कार्रवाई के लिए किसकी रिपोर्ट चाहिए। दोषियों को दंड न्याय व्यवस्था से मिलेगा लेकिन अफसरों ने शुरू से केस कमजोर करने में कोई कसर नही छोड़ी। मामला बढ़ा तो सत्ता का सुर बदल रहा है। अधिकारियों पर मामला डालकर पल्ला झाड़ने की कोशिश हो सकती है क्योंकि अब कोर्ट ने भी इसका स्वतः संज्ञान ले लिया है। लेकिन कौन भरोसा करेगा कि कार्रवाई के लिए जो ईमानदारी चाहिए वह दिखाई गई।
मामला ज्यादा न बढ़े इसलिए परिवार को मीडिया की आंखों से बचाकर दबाव में लेने की कोशिश हुई। डीएम ने परिवार को धमकाया। 25 लाख रुपये, मकान आदि देकर मनाने की कोशिश हुई साथ ही बता दिया कि अगर कोई बयान दिया तो हम भी पलट जाएंगे। जिस सरकार में गाड़ी सरेआम पलटती हो वहां एक डीएम के पलट जाने के बयान से एक गरीब परिवार कितनी दहशत में होगा कल्पना कीजिये। ऊपर से न वकील मिल सकते हैं, न रिश्तेदार न पत्रकार। किस तरीक़े से एसआईटी का उनका बयान ले रही होगी ये भी समझना कठिन नही है। 
कदम कदम पर बेशर्मी, तानाशाही भरा खतरनाक रवैया। साफ दिखाता है सत्ता का मद कभी कभी किस तरह से असंवेदनशील बना देता है।
पुलिस ने सुदीक्षा मामले में कहा छेड़छाड़ नही हुई। मुआवजा प्रेरणा स्थल आदि बनाकर जनाक्रोश को अपने सियासी छद्म से शांत किया। हाथरस की गुड़िया के लिए भी आनन फानन में कह दिया कि रेप नही हुआ। फिर इतने दिन बाद कोई जांच कराकर सिद्ध भी कर दिया कि रेप नही हुआ। 
 यहां बेझिझक इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि केवल स्पर्म का मिलना ही रेप होने का प्रमाण नही हो सकता। बल्कि आरोपियों का मकसद भी देखना जरूरी है। अगर जननांगों को रेप के लिए  नुकसान पहुंचाया गया। बुरी नीयत प्रयास भी किया गया तो ये सब रेप के दायरे में है। सबसे बडी बात मृतका का बयान है वह किसी भी जांच रिपोर्ट पर भारी है।
ऐसा नही है कि पुलिस को कानून नही पता या सरकार नही जानती कि कानून खुद सारे राजनीतिक दलों ने मिलकर बदला था कि शायद बेटियों के लिए हालात कुछ बदल जाये। लेकिन बदलाव के लिए खुद को बदलना भी जरूरी है। और हाथरस की घटना इस बात की गवाह है कि न खाकी का रवैया बदला न खादी का और समाज के विभाजित दृष्टिकोण के बीच बेटियां अपने हक के लिए वही खड़ी हैं। जहां सालों पहले खड़ी थी। 
लेकिन सरकार में कोई भी हो ये जरूर जान लें आप किसी भी वेश भूषा को आवरण बनाकर खुद को अलग दिखाने की कोशिश करें जनता नीति और नीयत दोनो को परखना जानती है। अहंकार कभी भी दीर्घजीवी नही होता। हाथरस की बेटी को न्याय न मिला तो ये आत्मघाती होगा। बापू की जयंती पर नारियों के मन का वेग सरकार न समझी तो उसे पछताना पड़ेगा। महंत की वेशभूषा नही शासन की कला से मुख्यमंत्री योगी का इम्तिहान होगा।






Enter the following fields. All fields are mandatory:-
Name :  
  
Email :  
  
Comments  
  
Security Key :  
   8790519
 
     
Related Links :-
इस बार दीपावली बहुत खास है...
निर्भया से हाथरस तक बेटियों पर सत्ता का मिजाज न बदला
चुनौतियां कितनी बड़ी हों, संकल्प उससे भी बड़ा है, देश न थकेगा न रुकेगा....
भारत न कभी झुका है न झुकेगा, प्रधानमंत्री की लद्दाख यात्रा के मायने
धोखेबाज चीन को सबक सिखाओ हिंदुस्तान
जाहिलों की जमात, आपराधिक लापरवाही
समझ आया बजट?
हैदराबाद की सीख......
उन्मादी पाकिस्तान चीन से मिलकर कर रहा साजिश
चांद भी अपना होगा चांदनी भी हमारी .....
 
CopyRight 2016 DanikUp.com