दैनिक यूपी ब्यूरो
02/07/2020  :  09:48 HH:MM
काठ की हांडी बार बार नही चढ़ती, कोरोना काल मे केजरीवाल की हकीकत सबको पता चल गई है - विष्णु मित्तल
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विष्णु मित्तल दिल्ली भाजपा के युवा कोषाध्यक्ष हैं। 36 साल की उम्र में उन्हें ये जिम्मेदारी मिली थी। लेकिन राजनीति के साथ- साथ हजारों लोगों को जोड़कर वे एक संस्था आओ साथ चलें संचालित कर रहे हैं और संस्था के द्वारा सेवा का मिशन ही उनकी असली पहचान है। पार्टी में प्रचार से दूर पर्दे के पीछे की रणनीति में शामिल रहना, पार्टी के लिए फंड एकत्र करना और अन्य तमाम जिम्मेदारी के बीच मित्तल राजनीति से ज्यादा सेवा कार्यो पर बात करना पसंद करते हैं। दैनिक यूपी की एडिटर इन चीफ अंजना शर्मा से उनकी एक्सक्लूसिव बातचीत

प्रश्न - आप पेशे से सीए हैं। समाजसेवा या राजनीति करना है ये कैसे मन मे आया? 
 उत्तर -लंबी कहानी है लेकिन संक्षेप में बताता हूँ। मैं राजस्थान के जयपुर जिले में एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखता हूँ। बहुत छोटा था उस वक्त गांव में अकाल पड़ा था, प्लेग की बीमारी फैली थी। गांव में कई लोगों की मौत भी हो गई। मुझे उसी समय बड़ा दुख हुआ कि गांव में कैसी व्यवस्था है। लोगों के सामने कितनी परेशानी है। मैंने मन मे सोचा था पढ़ लिखकर आईएएस बनूंगा। जिले का कलेक्टर बनकर लोगों की सेवा करूंगा। लेकिन सीए किया। पढ़ाई के दौरान ही घर की परिस्थिति ऐसी थी कि मुझे कहा गया कि अब कुछ काम करना पड़ेगा। मैंने तैयारी छोड़कर सीए की प्रैक्टिस शुरू कर दी। जब सेटल हुआ घर के लोगों की भी मदद करने लायक हो गया तो उम्र साथ नही थी कि साथ मे तैयारी कर पाता। लेकिन मुझे लगा कि मैं  लोगों की मदद कैसे कर पाऊंगा। इसी उधेड़बुन में मुझे लगा कि काफी लोगों के लिए काम करना है, पॉलिटिक्स एक माध्यम है जहां  आकर ज्यादा लोगों की मदद कर सकता हूँ। न मेरे परिवार में कोई पॉलिटिक्स में था न कोई गॉड फादर। कार्यकर्ता की तरह मनोयोग से काम मे जुट गया।
 
प्रश्न - आप भारतीय जनता पार्टी के कोषाध्यक्ष भी हैं। कम उम्र में आपने पार्टी में अच्छा मुकाम हासिल किया? क्या मकसद है आगे राजनीति का?
उत्तर - मैं कभी सोचता नही आगे क्या होना है। मैंने ये भी नही सोचा था कि कोषाध्यक्ष बनूंगा। मुझसे कहा गया कि आप सीए हो मुझे जिम्मेदारी दी गई। तीन साल कोषाध्यक्ष के रूप में जो काम करना चाहिए केवल काम करता रहा। कभी मंच पर नही गया। चुपचाप काम करता रहा। आगे भी पार्टी जो तय करेगी करूंगा। मेरा प्राथमिक उद्देश्य सेवा है। राजनीति उसका माध्यम है।

 प्रश्न  -  आपने राजनीति के साथ आओ साथ चलें जैसी स्वयंसेवी संस्था शुरू की? क्या लक्ष्य है?
 
उत्तर - पहले भी काम करता रहता था। जो भी सेवा का काम आए मित्रों के सहयोग से मदद में जुट जाते थे। किडनी ट्रांसप्लांट करानी है तो दोस्तो के साथ मिलकर पैसा इकट्ठा करके ऑपरेशन में मदद कर दी। किसी ने कुछ और बताया तो सबके सहयोग से कर लिया। बाद में सोचा बड़े पैमाने पर करना है। लोगों को जोड़ना है। रोजगार देना है टीडीएस काटना है तो एक व्यवस्था बना ली जाए। सबने तय किया आओ साथ चलें नाम से एक सोसायटी या ट्रस्ट रजिस्टर कर लें। अब संस्था के जरिये व्यवस्थित तरीके से ज्यादा लोगों तक पहुंच रहै हैं।
 
 प्रश्न-क्या तरीका है काम का? कितने लोगों की मदद कर पाते हैं?
 उत्तर- कई सारे प्रोजेक्ट हैं। दिल्ली जयपुर हाइवे पर कोठपुतली पड़ता है। वहां एक सरकारी अस्पताल है। जहाँ पर बीमार व्यक्ति और तीमारदार पास के गांवों से आते हैं। उनके पास खाने की व्यवस्था नही होती थी। तय किया कि रोज चार - पांच सौ लोगों को खाना खिलाएंगे। पहले हुआ पैसा कैसे आएगा अगर रेगुलर करना है। शुरू में तय किया कि जिसका जन्मदिन है वो यहां आकर लोगों को खाना खिलायेगा। धीरे धीरे चार पांच सौ लोग जुड़ गए। अब जिसका भी जन्मदिन होता है। वहीं आकर केक काटता है लोगों को खाना खिलाता है। मिलकर जन्मदिन मनाते है और सेवा भी होती है।कोठपुतली से कुछ आगे शाहपुरा है। वहां हमने बंदरो के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू किया। रोज सौ किलो आटा की पूरी आओ साथ चलें के कार्यकर्ता बनाते हैं। बंदरो को खिलाया जाता है। यहां भी बिल्कुल उसी तरह से जन्मदिन मनाने के लिए लोग जुड़ते हैं। 12 जुलाई को इस प्रोजेक्ट को एक साल हो जाएगा। कोरोना, आंधी, तूफान कभी भी ये सिलसिला नही थमा। तीसरा प्रोजेक्ट हमने दिल्ली के सरकारी अस्पताल में शुरू किया। आरएमएल में हमारे वालिंटियर वहां रहते हैं ओपीडी, इमरजेंसी, मोर्चरी में मदद करते हैं। अपाहिज, वृद्ध,  महिलाओं की पूरी मदद करते हैं। उन्हें डॉक्टर को दिखाने से लेकर दवा दिलाने तक। इसी तरह इमरजेंसी में कोई मरीज आया तो उसका वक्त औपचारिकता में जाया न हो तुरंत इलाज शुरू हो जाए, इस काम मे हमारे वॉलिंटियर्स मदद करते हैं।  मोर्चरी में भी कई शव इस तरह से आते हैं जिनकी औपचारिकता पूरी करने में मदद की दरकार होती है। कुछ लोगों के पास एम्बुलेंस से बॉडी ले जाने के पैसे नही होते उनको मदद करते हैं। कुछ कैंसर पेशेंट को अडॉप्ट किया है। इसी तरह का काम सफदरजंग में शुरू किया। कोरोना की वजह से ओपीडी बंद हुई तो प्रोजेक्ट कुछ दिनों के लिए बंद हो गया था। लेकिन फिर शुरू किया है। कोई बच्चा फीस नही जमा कर पा रही। उसकी फीस जमा करने में मदद करते हैं जिससे पढ़ाई न छूटे।

प्रश्न - कोरोना संक्रमण के दौरान लोगों की सहायता करना तो बहुत कठिन काम था। कैसे लोगों तक पहुंचे? 
 उत्तर-बाकायदा प्लान किया। आशंका थी लोगों का काम बंद होगा। नौकरी जाएगी, क्योंकि ऐसा संकट है किसी को कुछ नही पता। सरकार अपने स्तर से लोगो तक पहुंच रही है। हमने तय किया दिल्ली में ऐसे लोगों तक पहुंचना है जहाँ सरकार नही पहुंच पा रही है। कौन से लोग हैं जिनको ज्यादा जरूरत है उनकी पहचान कर मदद पहुंचाते थे। सबके मन मे था इंसान की एक न एक दिन मौत होनी ही है। घर बैठकर लोगों की मदद कैसे कर पाएंगे। इसलिए मदद के लिए निकलना है। इस दौरान हमारा एक कार्यकर्ता कोरोना पॉजिटिव भी हो गया था। अब ठीक है। सब मिलकर कर रहे हैं। मैं अकेला नही कर रहा।

 प्रश्न  - इन सब काम के लिए बहुत धनराशि चाहिए होती है। फंड एक बड़ी चुनौती होता है। लोग आसानी से जुड़ते हैं या बहुत मशक्कत करनी पड़ती है? 

उत्तर- मशक्कत तो होती ही है। पहले शुरू किया तो लगता था कितने दिन चलेगा। शुरू कर देता हूँ तो लोग अपने आप जुड़ने लगते हैं। जैसे कोरोना के दौरान शुरू में मैने 400 किट बनवाई। फिर लोग आ गए साथ मे हजारों लोगों तक हम पहुंचे। इसी तरह एक 28 साल का लड़का था उसकी किडनी ट्रांसप्लांट होनी थी। उसकी माँ किडनी देने को तैयार थीं। लेकिन उनके पास ऑपरेशन के लिए पैसा नही था। पांच लोगों ने एक - एक लाख रुपये सहयोग किया। ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया। समाज मे बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि उनका पैसा सही जगह लग रहा है दुरूपयोग नही होगा तो लोग मदद के लिए आगे आते हैं। 
प्रश्न - आओ साथ चलें के  विस्तार का क्या लक्ष्य है? 
 उत्तर-बहुत काम करेंगे। अभी छोटी सी शुरुआत है। गांव में शिक्षा की काफी समस्या है। हमने पानी के लिए काम शुरू किया है। पानी और शिक्षा के लिए बड़े पैमाने पर काम करेंगे। जैसे जैसे लोग जुड़ेंगे, फंड का इंतजाम होगा हम व्यापक स्तर पर काम करते जाएंगे।

 प्रश्न  - कहा जाता है कोई न कोई गॉड फादर होना चाहिए  वरना पॉलिटिक्स आसान नही है। ये धारणा कितना ठीक है?
 
उत्तर - शुरू में समस्या आती है। काफी हद तक लगता है कोई एक तो होना चाहिए जो आगे लेकर जाए। लेकिन हमेशा ऐसा जरूरी नही होता। कई बार आदमी का टैलेंट आगे पहुंचाता है। मेरा कोई गॉड फादर नही था। मेरे काम को देखकर, भाग्य में था शायद कि मुझे पार्टी ने कोषाध्यक्ष बनाया। मैंने काम से अपनी पहचान बनाई। अब आगे क्या होगा इसके लिए मुझे गॉड फादर की जरूरत  नही होगी । क्योंकि काम किया है पार्टी को लगेगा  अच्छा काम किया है तो आगे भी करेगा। पार्टी हमेशा अपने काम करने वाले कार्यकर्ताओ का उपयोग करती है।  इसके लिए हमेशा किसी का पीछे होना जरूरी नही है।

 प्रश्न- दिल्ली में भाजपा क्यों नही आ पा रही है? दो बार से केंद्र में सरकार भी है, शीर्ष स्तर पर मजबूत नेतृत्व भी है। बार बार पूरी ताक़त लगाकर भी पार्टी सत्ता से बाहर है? क्या वजह?
उत्तर- ईमानदारी से कहूं तो कई वजह है। एक वजह तो ये है कि हमारा संगठन एकजुट नही रहता। स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि हमारे नेता एकजुट होकर चुनाव नही लड़ते।  एमसीडी में करप्शन भी एक वजह है। पंद्रह साल से एमसीडी में हम हैं। हर आदमी का  नाता एमसीडी से पड़ता है। चाहे सफाई,नाली साफ करवाना, कूड़ा या मकान बनवाना हो। अधिकारियों के स्तर पर बहुत भ्रष्टाचार है। इसका ठीकरा हमारे सिर फूटता है। हो सकता है हमारे भी कुछ लोग हों। लोगों को लगता है एमसीडी में ठीक से काम नही हो रहा। आम लोगों को जूझना पड़ता है। एक वजह ये भी है कि केजरीवाल ने लोगों को  मूर्ख बनाया। पिछले पांच, साढ़े पांच साल में दिल्ली में कोई काम नही हुआ। दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या पानी, प्रदूषण, ट्रैफिक है। लेकिन कोई काम नही हुआ। केवल केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट पर काम हुआ। लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हुए। प्रदूषण का बुरा हाल है। ट्रैफिक में दो दो घण्टे लोगो को खड़ा होना पड़ता है।  फ्री बिजली पानी का लालच दिया गया।  लोग इससे अंतिम मौके पर प्रभावित हुए। लेकिन मुझे उम्मीद है लोगों को ध्यान में आएगा। अब देखिए कोरोना की वजह से दिल्ली में लोग किस तरह से बेहाल हुए। हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी कमान नही संभालते तो दिल्ली का बहुत ही बदतर हाल होता। मुझे उम्मीद है लोगों को समझ आएगा। अगले चुनाव में भाजपा ही आएगी। लोगों को पता चल गया है वास्तविकता क्या है। केवल श्रेय लेने में केजरीवाल आगे हैं। कहावत है काठ की हांडी बार बार नही चढ़ती।

 प्रश्न- दो बड़ी वजह हार की बताई। सुधार के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं?
 उत्तर -गुटबाजी खत्म करने के लिए पार्टी एक नया अध्यक्ष लेकर आई जो जमीनी कार्यकर्ता  हैं। किसी गुट से नही हैं। आगे भी ऐसे लोगों को संगठन में जगह मिलेगी ये उम्मीद करना चाहिए। मानकर चलिए जमीनी काम करने वालों को सम्मान मिलेगा जो वास्तविक कार्यकर्ता हो किसी गुट का न हो। केंद्रीय नेतृत्व को सब पता है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस है।  अवैध कालोनी के नियमतीकरण से भ्रष्टाचार खत्म करने की बड़ी कोशिश की गई। हमारी सरकार होती तो बहुत कुछ पटरी पर आ गया होता।
 
प्रश्न-क्या संगठन में और भी बदलाव होंगे? 
 
उत्तर-देखिये ये तो नेतृत्व को तय करना है। लेकिन पार्टी अलग मूड में है देखिएगा बहुत अच्छा काम होने वाला है। दिल्ली में कहीं कोई कमी नही रह जायेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में केंद्र सरकार का काम और जमीनी कार्यकर्ताओ की मेहनत से दिल्ली की तश्वीर जरूर बदलेगी। हर स्तर पर कोशिश हो रही है कि सुधार हो। 
 
प्रश्न - युवा और महिला हर पार्टी में इन्हें आगे लाने की बात होती है लेकिन कभी अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व उन्हें नही सौंपा जाता क्या वजह है? 

 उत्तर -भाजपा में ऐसा नही है। महाराष्ट्र में फडणवीस जी युवा मुख्यमंत्री बनाये गए थे। आदेश गुप्ता जी 50 की उम्र के भी नही हैं। जयराम ठाकुर को देखिए। मैं 36 साल की उम्र में कोषाध्यक्ष बना। पहले 60 - 65 साल की उम्र के लोगों को कोषाध्यक्ष बनाया जाता था। दूसरी पीढ़ी आ रही है। युवा काफी आगे आये हैं। 
 
प्रश्न- राजनीति वाकई में सेवा का माध्यम बने, इसके लिए क्या सुधार होना चाहिए? 
 उत्तर -अब तो काफी जागरूकता आ रही है। मैं ओम बिड़ला जी का उदाहरण देता हूँ। वे लोकसभा अध्यक्ष हैं। लोग भूखे पेट न सोएं, उनके तन पर कपड़े हों,  कोटा में जितने प्रोजेक्ट उन्होंने चलाये हैं वे उदाहरण हैं।  प्रधानमंत्री ने खुद सदन में उनके समाज सेवा के  काम की प्रशंसा की। इससे सीख मिलती है कि काम के बल पर आप कैसे आ सकते हैं। कई लोग कर रहे हैं। गौतम गंभीर ने काफी अच्छा काम लाकडाउन में किया है। प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर भाजपा ने पार्टी के रूप में जिस तरह से लाकडाउन के दौरान लोगों की सेवा की वह अपने आप मे उदाहरण है। अभी भी हम दस लाख लोगों को काढ़ा का पैकेट दे रहे हैं। अब काफी लोग राजनीति में चाहते हैं कि समाजसेवा के जरिये लोगों से जुड़े।
 
प्रश्न -एक कार्यकर्ता के नाते भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या लगती है?
 उत्तर -एक सामान्य व्यक्ति के नाते मैं कहूंगा, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय निर्माण और जनधन खाते खोलना बड़ी उपलब्धि मानता हूँ। पहले गांव में महिलाओं को बाहर शौच के लिए जाना पड़ता था। कितनी बड़ी समस्या थी। अपमान होता था। मैं अभी कुछ समय पहले गांव गया पिता जी ने बताया मेरे गांव में एक घर नही बचा जहाँ शौचालय न हो। जन धन खाता खुला तो लोग कहते थे इसमे पैसा नही होगा। लेकिन इन्ही खातों के जरिये संकट काल मे भी गरीबो के खाते में,महिलाओं के खाते में सीधा पैसा जा रहा है। ये एकदम आम व्यक्ति से जुड़े मामले हैं। वैसे धारा 370 समाप्त करना, तीन तलाक की प्रथा खत्म करना ये ऐसे काम हैं जो हमेशा याद रखे जाएंगे।






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