दैनिक यूपी ब्यूरो
05/09/2019  :  10:37 HH:MM
महान शिक्षाशास्त्री थे डॉ. राधाकृष्णन
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भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्म दिवस पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण उनका शिक्षा के प्रति समर्पण और शिक्षा के वास्तविक गुणों को आत्मसात करना रहा। वह राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत ,दर्शनशास्त्र, कुशल प्रशासक और महान तत्ववेत्ता विचारक थे। सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुतणी नामक कस्बे में हुआ। उनका परिवार प्रांगानाडु नियोगी ब्राह्मण जाति का था।

उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी एवं माता का नाम श्रीमती सीताम्मा था। डॉ. राधाकृष्णन अपने माता पिता की दूसरी संतान थे। उनके पिता श्री वीरास्वामी शिक्षक होने के साथ पुरोहिताई का कार्य भी करते थे। इस प्रकार उनके परिवार में धर्म एवं शिक्षा का वातावरण था जिसका प्रभाव डॉ. राधाकृष्णन पर होना स्वाभाविक भी था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ही कस्बे तिरुतणी के अल्लामा राम प्राथमिक स्कूल से प्रारम्भ हुई। दसवीं की परीक्षा लुधरन मिशन हाई स्कूल से पास करने के बाद उन्होंने वूरहेस कॉलेज बेल्लौर से एफ.ए.किया। पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह शिवकामा से साथ हो गया। दर्शन शास्त्र के साथ उन्होंने मद्रास प्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कुशाग्र बुद्धि वाले होने के कारण उनकी अपने विषयों के साथ साथ अंग्रेजी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ बन गई। उन्होंनें इसी महाविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया। एम.ए. की उपाधि के लिए उन्होंने सन् 1908 ई. में शोध प्रबंध ‘दि एथिक्स ऑफ वेदान्त’ शीर्षक से प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने अपनी शिक्षा का आधार भारतीय वेद दर्शन को बनाया। अपने पहले ही शोध प्रबंध में उन्होंने वेदान्त के मायावाद का गहन विशलेषण किया। उन्होंने कहा कि वेदान्त दर्शन इस जगत को अविद्या की सृष्टि मानता है। यह जगत अनित्य है,भ्रम है और मृगतृष्णा है। अविद्याजनित यह भ्रम ज्ञान के द्वारा समाप्त हो जाता है परन्तु उस स्थिति में भी यह भासमान जगत विद्यमान रहता है। उसका अस्तित्व नहीं मिटता। वह अपनी पहली ही रचना से लेखन के क्षेत्र में पहचाने जाने लगे। उनके शोध प्रबंध की विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रशंसा की गई। यहीं से उनकी लेखन क्षमता के साथ साथ विद्वता की चर्चा होनी प्रारम्भ हो गई। अधिकांश विद्वानों का मत था कि, इस शोध प्रबंध में दर्शनशास्त्र के न केवल मूल सिद्धांतों का विवेचन किया गया है बल्कि उन्हें आत्मसात भी कर लिया गया है। जटिल एवं गंभीर मुद्दों को सहज ढंग से अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता और अंग्रेजी भाषा में अधिकार पूर्ण प्रवाह में अपनी बात कहने में यह प्रबंध आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है। बाद में विश्वभर में उन्हें धर्मशास्त्र का विलक्षण व्याख्यता माना गया। अपने संपूर्ण व्यक्तित्व में वह एक महान शिक्षा शास्त्र, मौलिक विचारों के प्रवक्ता, सात्विक लेखक और महान दार्शनिक स्वीकार किए गए। एम.ए.करने के पश्चात वह प्रेसीडेंसी कालेज मद्रास में दर्शन शास्त्र के अध्यापक नियुक्त हो गए। सन् 1918 ई. में डॉ राधाकृष्णन को मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया। 1928 ई. में वह कलकता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने के लिए चले गए। उन्होंने सन् 1931 से 1936 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद को सुशोभित किया। सन् 1936 से 1952 तक वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाते रहे। इससे पूर्व वह 1939 से 1948 तक बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के कुलपति रहे थे। एक ऐसा अवसर भी आया था जब डॉ. राधाकृष्णन कलकत्ता, काशी और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों का कार्य एक साथ देख रहे थे। डॉ राधाकृष्णन अपने हृदय में मानवता के प्रति अगाध प्रेम रखते थे। उनका मत था कि यदि निष्ठापूर्वक वस्तुओं पर अतंरात्मा की शक्ति स्थापित कर दी जाए तो मानव जीवन मंगलमय और कल्याणकारी हो जायेगा। उनका दृष्टिकोण सभी के लिए एक जैसा कल्याणकारी था। वह जानते थे कि भारतीय समाज अस्वस्थ वृत्तियों से अप्रांत है,परन्तु यह समाज इतना अधिक बीमार भी नहीं है कि इसे रोगमुक्त किया ही न जा सके। भारतीयों की प्रतिभा और मान्यताओं पर उनका अडिग विश्वास था। एक बार जब वह अमरीका प्रवास कर रहे थे तो उन्होंने कुछ संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि, भारत में विभिन्न धार्मिक विश्वासों, जातियों और आर्थिक स्तरों के करोड़ों लोगों ने गत दो शताब्दियों के मध्य राष्ट्रीय सामंजस्य और प्रजातंत्रीय भावना उत्पन्न करने में ऐसी सफलता प्राप्त की है कि जिसे देख कर निराशावादी भविष्य वक्ताओं को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा है। इसी सन्दर्भ में एक बार उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता के
विषय में विचार व्यक्त करते हुए कहा था, आपने लोगों को धरती पर तीव्र गति से दौडऩा,आसमान में बहुत ऊंचाई तक उडना और पानी पर तैरना तो सिखा दिया परन्तु मनुष्यों की तरह रहना आपको नहीं आया। डॉ. राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मानते
थे। मानवीय गुणों के विकास एवं धार्मिक शिक्षा पर वह बहुत बल देते थे। वह मानते थे कि व्यक्ति के जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान। आज हमारी शिक्षा प्रणाली पश्चिम के प्रभाव के कारण विद्यार्थियों में स्वार्थ, बेईमानी और अहंकार की भावनाओं को बढ़ावा दे रही है। वह कहते थे कि विश्वविद्यालय गंगा और यमुना के संगम की तरह शिक्षकों और छात्रों का पवित्र संगम है। शिक्षा के लिए बड़े बड़े भवन और विभिन्न प्रकार की साधन सामग्री उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितने कि शिक्षक। उनका मत था कि, विश्विद्यालय ज्ञान बेचने की दुकानें नहीं हैं, वे तो ऐसे तीर्थस्थल हैं जिन में स्नान करने से व्यक्ति की बुद्धि, इच्छा और भावना का परिष्कार और आचरण का संस्कार होता है। विश्वविद्यालय बौद्धिक जीवन के देवालय हैं, उनकी आत्मा है ज्ञान का शोध हैं। वे संस्कृति के तीर्थ और स्वतंत्रता के दुर्ग हैं। डॉ. राधाकृष्णन हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। उन्हें इस बात पर गर्व का अनुभव होता था कि वह इस पवित्र और ऋषिमुनियों की धरती पर जन्में और हिन्दुत्व उनकी शिराओं में दौड़ रहा है। वह एक आस्थावान हिन्दू थे परन्तु वह अन्य सभी धर्मों के प्रति समान आदर भाव रखते थे। सादगी पसन्द डॉ. राधाकृष्णान स्वभाव से अत्यंत विनम्र और धौर्यवान थे।

जीवन के अंतिम दिनों में सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की मोतियाबिन्द के कारण देखने की क्षमता कम हो गई थी फिर भी उनका लेखन और पठन पाठन विचार विमर्श के साथ अविरल चलता रहा। 17अपैल 1976 को मद्रास में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और हृदयाघत के कारण वह इस नश्वर शरीर को त्याग कर हमारे मध्य से चले गए। उनके परिवार में पांच पंत्रियां एवं एक पुत्र था। आज भी राष्ट्र उन्हें एक महान शिक्षक के अतिरिक्त एक दर्शनिक राष्ट्रपति के रूप में स्मरण करता है।






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