दैनिक यूपी ब्यूरो
27/07/2019  :  10:04 HH:MM
इनफर्टिलिटी बीमारी:जो पुरुष-महिला दोनों में से किसी के भी वजह से हो सकती
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हिसार भारत में औसतन 2.7 करोड़ कपल्स में हर वर्ष इनफर्टिलिटी का पता चलता है। शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच अब इस सामान्य रूप से पाये जाने वाली स्वास्थ्य समस्या में बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव का स्तर उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं।

प्रभावित कपल्स में से, भारत के अनुमानत: 10-15 प्रतिशत इनफर्टाइल कपल्स सक्रियतापूर्वक उपचार कराना चाहते हैं, जिनमें से केवल 1 प्रतिशत ने आईवीएफ उपचार की मांग की है। हालांकि, अभी भी ऐसे अनेक कपल्स हैं जो इनफ र्टाइल होने के पीछे के निहित कारणों को लेकर अनजान हैं, और जिनका यह भी मानना है कि इनफ र्टिलिटी के लिए महिलाएं जिम्मेवार हैं। नोवा इवी फर्टिलिटी के मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. मनीष बैंकर ने कहा, प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ, दंपतियों के पास आज इनफर्टिलिटीसे लडऩे के लिए कई उन्नत
तकनीकों तक पहुंच है। हालांकि, हल करने के लिए एक बड़ी चुनौती आमतौर पर माना जाता है कि महिला साथी इनफर्टिलिटीके लिए जिम्मेदार है। यह जानकर हैरानी होती है कि आईवीएफ का विकल्प चुनने वाले कई दंपति पुरुष और महिला कारकों के बारे में नहीं जानते
हैं जो स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण करने में असमर्थता की भूमिका निभाते हैं। माना जाता है कि इनफर्टिलिटी अभी भी एक लिंग विशिष्ट मुद्दा है। वास्तव में, हमने कई मामलों में देखा है कि पुरुष साथी बोलने से बचते हैं या इनफर्टिलिटीकी जांच करवाते हैं। एक स्पष्ट
संकेतक, कि पुरुष साथी को इनफर्टिलिटीके कारण के रूप में नहीं देखा जाता है। दोनों पुरुष और महिला कारक क्रमश: जोड़े के बीच इनफर्टिलिटीका 40-50 प्रतिशत है। इसलिए, इनफर्टिलिटी से जूझ रहे जोड़ों को दोनों भागीदारों के लिए सही मदद खोजने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। डॉ. बैंकर कहते हैं, रोगी परामर्श आईवीएफ उपचार चाहने वाले जोड़ों के बीच जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह उपचार के विकल्प या अंतर्निहित स्थिति के कारणों के बारे में जानकारी हो, यह सुनिश्चित करने के लिए हर आईवीएफ सलाहकार की जिम्मेदारी है कि रोगी को अच्छी तरह से सूचित किया जाए। परामर्श एक सकारात्मक भावनात्मक दृष्टिकोण को बनाए रखने में भी योगदान देता है जो उपचार की प्रक्रिया के दौरान आवश्यक है, स्थिति की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए। 25 जुलाई 1978 को दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुईस ब्राउन का जन्म हुआ था। उसके जन्मदिन को विश्व आईवीएफ दिवस के रूप में मनाया जाता है। लुईस ब्राउन के जन्म के बाद से 41 वर्षों में आईवीएफ की मूल चीजें नहीं बदली हैं, लेकिन विज्ञान ने बड़े-बड़े डग भरे हैं, असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बदलाव लाया है और इन सभी का श्रेय कई नये तथ्यों, तकनीकों एवं पद्धतियों को जाता है। इनमें से प्रत्येक कारक ने 100 प्रतिशत सफलता दर हासिल करने के अंतिम लक्ष्य को करीब लाने में योगदान दिया है।






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