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दैनिक यूपी ब्यूरो
30/06/2019  :  09:34 HH:MM
फलदार वृक्ष विनम्र क्यों नहीं?
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कहीं नेता पुत्र ने बल्ला भांज दिया। कहीं किसी से कहासुनी हुई तो हाथ पैर तोडऩे से खुद को न रोक पाए। किसी उभरते नौजवान नेता की बात बुरी लग गई तो उसका जीने का हक छीन लिया। ये कुछ घटनाएं हैं जिनका पूरा विवरण देने की जरूरत नहीं। किसी दल विशेष से भी जोडऩे की आवश्यकता मैं नही समझता।

जिन घटनाओं के लिए जो जहां जिममेदार है सबके सामने है। लेकिन मैं असल समस्या की ओर ध्यान अवश्य दिलाना चाहता हूं। फलदार वृक्ष झुक जाता है ये कहावत उन लोगों पर लागू क्यों नही होती जिन्हें लोगों के समर्थन से ही ताकत मिलती है। जनता के समर्थन से जीतकर जनप्रतिनिधि, सांसद या विधायक का दर्जा पाने वाले अगर अपना आपा खोने लगें तो कहीं न कहीं तो गड़बड़ है। हमारे चुनाव के तरीके में दोष है? सिस्टम में दोष है? या जन अपेक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव है? विश्लेषण करने पर अलग-अलग घटनाओं में अलग कहानी मिलेगी। बाहुबल और धनबल आज भी हमारी चुनावी व्यवस्था का बड़ा दोष है। धन और बाहुबल का इस्तेमाल करके विजय हासिल करने वालों को लगता है कि जब उन्हें सत्ता की सीढ़ी ही ताकत के इजहार से मिली है तो जीत के बाद प्रदर्शन करने से गुरेज क्यों
करना? इनको कहीं भी बल्ला भांजना पड़े। किसी की गर्दन पर बंदूक ताननी पड़े ये बेअन्दाज होकर कर सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा। एक केस दर्ज होगा। चंद दिनों बाद जमानत मिलनी ही है। फिर उसी ताकत से अपने ऊपर दर्ज केस की रीढ़ तोड़ देने में इन्हें वक्त 
नहीं लगता। दरअसल हमारा सिस्टम, हम सभी इन व्यवस्थाओं में जीने के आदी हो चुके हैं। अगर नेता को हम कोसने लगे तो भला अधिकारी को क्या कहें। जिनकी ट्रेनिंग ही काम को घुमा देने की होती है। बाबुओं पर तो न जाने कितनी कहानियां लिखी जा चुकी हैं। उनके
कौशल से बड़े बड़ो के पसीने छूट जाते हैं। 

जब नैतिकता का आकलन में कौन अपना कौन पराया पैमाना हो तो ये समस्या शाश्वत बन जाती है। कौन ठीक करेगा? अपना आदमी है तो बचाना ही पड़ेगा। सीधे न सही पर्दे के पीछे से। हम कहेंगे ये नहीं होना चाहिए था लेकिन बेबसी ये है कि अपना है। कर दिया तो
कर दिया। यही सारी गड़बड़ी की जड़ है। इससे न तो संस्थान अछूते हैं न व्यक्ति न समाज। इसलिए अगर कोई घटना कहीं हो जाये तो किसने किया इससे ज्यादा इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि घटना हुई क्यों। मेरा मानना है कि दुनिया जिस तेजी से बदल रही
है उसमें सामंती सोच से उपजी विकृत मानसिकताओं को परास्त करने के लिए सबको एक सुर में बोलना चाहिए। दल कोई भी हो हर जगह जो भी अच्छे लोग हैं उनको आगे आना चाहिए। सबसे बड़ी जिम्मेदारी नेतृत्व की है। सार्वजनिक मंचों पर आदर्श बघारने के बजाय काम में आदर्श नजर आना चाहिए। इस समय देश मे दोबारा प्रचंड बहुमत से जीतकर आई ऐसी सरकार है जिससे उम्मीदें आसमान पर है। जीत के बाद सेंट्रल हॉल में दिया गया मोदी जी का पहला भाषण देश का भरोसा बढ़ाने वाला था। उस भरोसे को कायम रखने की जरूरत है। उम्मीद है भरोसा कायम रहेगा। देश का कोई भी कोना हो। नेताओं को अधिकारियों को जनाकांक्षाओं को समझना होगा। समाज को दिशा देने के लिए संवाद और विवाद के बीच सही तरीके से फर्क करना होगा। एक दूसरे की सीमाओं का पालन करना होगा। लोगों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए, उनकी मान्यताओं की अवहेलना किये बिना, थोपने के बजाय सहमति का रास्ता अपनाकर सुशासन की राह पर आगे बढऩे की जिम्मेदारी जनता ने केंद्र व सभी राज्य सरकारों को दी है। कोई भी मारा पीटा जाए, किसी की भी हत्या हो जाये, कहीं भी जूता या बल्ला चल जाये। फैसला गुण दोष के आधार पर होना चाहिए। सही गलत के आधार पर होना चाहिए। सही काम के लिए इनाम और गलती के लिए बिना भेदभाव के दंड यही सुशासन की पहचान है। गलत रास्ता अपनाने वाले अपराधी, हत्यारे, कोई भी लबादा ओढ़ कर बैठे हों उनमे खौफ पैदा करने की जिम्मेदारी सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे हमारे नेतृत्व की है। जिनका चेहरा देखकर हम फैसले करते हैं। -जय हिंद






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