दैनिक यूपी ब्यूरो
18/06/2019  :  09:48 HH:MM
अपोलो के विशेषज्ञों ने सिकल सेल रोग पर डाली रौशनी
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चंडीगढ़ इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने विश्व सिकल सैल दिवस के मौके पर स्वास्थ्य जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया। यह दिवस 19 जून को मनाया जाता है। रक्त विकारों के प्रख्यात विशेषज्ञ डॉ गौरव खारया, क्लिनिकल लीड, सेंटर फ ॉर बोन मैरो ट्रांसह्रश्वलान्ट एण्ड सैल्युलर थेरेपी, सीनियर कन्सलटेन्टपीडिए ट्रिक हेमेटोलोजी- ओकोंलोजी एवं इम्युनोलोजी ने बताया कि भारत इस रोग के बोझ की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है और यह दक्षिण भारत, छत्तीसगढ़, बिहार, महाराष्ट्र तथा मध्यप्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा पाया जाता है।

डॉ गौरव खारया ने कहा, ‘‘सिकल सैल रोग खून का आनुवंशिक विकार है, जिसमें व्यक्ति का हीमोग्लोबिन प्रारूपिक एस आकार ;खून में दोषपूर्ण होता है। इस रोग में हीमोग्लोबिन के दोषपूर्ण आकार के कारण लाल रक्त कोशिकाएं एक दूसरे केे साथ जुडक़र क्लस्टर 
बना लेती हैं और रक्त वाहिकाओं में आसानी से बह नहीं पातीं। ये क्लस्टर धमनियों और शिराओं में बाधा बन जाते हैं और जिसकी वजह से ऑक्सीजन से युक्त रक्त का प्रवाह शरीर में ठीक से नहीं हो पाता। इससे व्यक्ति कई जटिलताओं का शिकार हो जाता है। सामान्य आरबीसी की उम्र तकरीबन 120 दिन होती है, जबकि ये दोषपूर्ण सैल ज़्यादा से ज़्यादा 10-20 दिनों तक जीवित रह पाते हैं। इस वजह से शरीर में हीमोग्लोबिन से युक्त कोशिकाओं की संख्या गिरती चली जाती है और व्यक्ति क्रोनिक एनिमिया का शिकार हो जाता है। डॉ. खारया ने कहा सिकल सैल एलील फ्रि क्वेंसी पर आधारित मॉडल विभिन्न प्रकार की आबादी में रोग के जि़ला-वार वितरण पर रोशनी डालते हैं। हालांकि यह रोग बहुत पुराने समय से ज्ञात है, इस पर ज़्यादा काम नहीं किया गया है। यह अफ्र ीकी, अरबी और भारतीय आबादी में अधिक पाया जाता है। यह ‘सिकल सैल बेल्ट’ में अधिक पाया जाता है, जिसमें मध्यम भारत का डेक्कन पठार, उत्तरी केरल और तमिलनाडू शामिल है। यह छत्तीसगढ़, बिहार, महाराष्ट्र तथा मध्यप्रदेश के पड़ौसी इलाकों में भी पाया जाता है।’ डॉ. खारया ने रोग के विभिन्न लक्षणों के बारे में जानकारी दी। ‘यह रक्त का आनुवंशिक विकार है, इसलिए जब नवजात शिशु पांच महीने का होता है, तभी उसमें रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं जैसे त्वचा का पीला पडऩा, आखों का सफेद होना। मरीज़ को जल्दी थकान होती है, हाथों-पैरों में सूजन और दर्द होता है। रोग की रोकथाम और मरीज़ की देखभाल के बारे में कहा, ‘व्यक्ति में सिकल सैल एनिमिया की स्थिति को जानना बहुत महत्वपूर्ण है। अविवाहित को जांच द्वारा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसने सिकल सैल एनिमिया का जीन तो नहीं या क्या उनमें यह दोषपूर्ण जीन है। ताकि वे अपने जीवनसाथी का चुनाव करते समय या गर्भावस्था की योजना बनाते समय उचित सतर्कता बरत सकें । जिन परिवारों में सिकल सैल रोग का इतिहास हो उनमें जन्मपूर्व निदान के द्वारा इस जीन को भावी पीढिय़ों में जाने से रोका जा सकता है। नियमित टीकाकारण ज़रूरी है। उचित दवाएं हाइड्रॉक्स्युरिया, पैनिसिलिन, फ ोलिक एसिड और एंटीमलेरियल प्रोफ ाइलेक्टिसस आदि देनी चाहिए। बोन मैरो ट्रांसह्रश्वलान्ट ही एकमात्र उपचार है। हालांकि लोग इस विकल्प के बारे में ज़्यादा जागरूक नहीं है।






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