दैनिक यूपी ब्यूरो
26/04/2019  :  10:15 HH:MM
भगवान भैरव की साधना-अराधना का दिन
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भगवान भैरव शक्तिशाली रुद्र रुप के लिए जाने जाते हैं। भगवान भैरव एक ऐसे देवता हैं जिनकी साधना करने वाले भक्त पर किसी भी प्रकार की ऊपरी बाधा, भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि का खतरा नहीं होता है। ऐसे ही शक्तिशाली भगवान भैरव की प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को साधना-अराधना होती है। कालाष्टमी की तिथि पर भगवान भैरव की विशेष रूप से साधना आराधना का अपना ही महत्व है।

तंत्र-मंत्र के साधकों के लिए यह महत्वपूर्ण समय होता है। भगवान भैरव को देवाधिदेव भगवान शिव का अवतार माना गया है। भगवान भैरव काशी के कोतवाल कहे जाते हैं, जिनकी इस माह पूजा की पावन तिथि यानी कालाष्टमी 26 अप्रैल को मनाई जा रही है। कालभैरव भगवान के प्राकट्य की भी अपनी ही धार्मिक कथा है। कालभैरव के जन्म को लेकर पुराणों में भी रोचक कथा मिलती है। इसके तहत शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में कौन सर्वश्रेष्ठ है इस पर वाद-विवाद हो गया। विवाद हुआ तो दोनों ने ही अपने आपको श्रेष्ठ बताया और आपस में एक दूसरे से युद्ध करने को आतुर हो गए। इसके बाद सभी देवताओं ने वेद से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है भगवान शिव ही सर्वश्रेष्ठ हैं। बताया जाता है कि वेद के द्वारा भगवान शिव को महिमा मंडित करना ब्रह्माजी को पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहना शुरु कर दिया। इससे वेद अत्यंत दु:खी हो गए। उसी वक्त एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। तब ब्रह्मा ने उनसे कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण ही मैंने तुम्हारा नाम रूद्र रखा, इसलिए तुम मेरी सेवा में आ जाओ। कथानुसार ब्रह्माजी के विरोधी आचरण पर भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया था और उन्होंने उसी क्षण भैरव को प्रकट करते हुए कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। कहा जाता है कि दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट कर धड़ से अलग कर दिया। इस पूरे वृत्तांत के बाद भगवान शिव के कहने पर भैरव जी काशी को चले गए, जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति प्राप्त हुई। इस प्रकार रूद्र ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्ति किया। इसलिए आज भी वाराणसी में भगवान भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है और उनकी पूजा की जाती है। खास बात यह है कि इनके दर्शन किए बगैर बाबा विश्वनाथ के दर्शन अधूरे मने जाते हैं।

भैरव को प्रसन्न करें ये काम

इस माह कालष्टमी 26 अप्रैल को है, अत: भगवान भैरव के साथ मां दुर्गा की पूजा अवश्य करें। ज्ञातव्य होना चाहिए कि संपूर्ण देश के सभी शक्तिपीठ और सिद्धपीठ में देवी दर्शन के बाद ही भगवान भैरव के दर्शन किए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार काल भैरव का वाहन
कुत्ता है। इसलिए काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाना उचित होता है। इस उपाय से कालभैरव के साथ ही साथ शनि देव भी खुश होते हैं। कहा जाता है कि जो साधक या भक्त शिव एवं शक्ति का साधक भगवान भैरव की प्रतिदिन साधना-
आराधना करता है, उसके लाखों जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं और वह शक्ति संपन्न हो जाता है। भगवान भैरव को मदिरा चढ़ाई जाती है, लेकिन जो मदिरा का सेवन नहीं करते उन्हें दूध ही चढ़ाना चाहिए। भगवान भैरव इससे भी प्रसन्न होते हैं और साधक व भक्त
को मनचाहा फल प्रदान करते हैं। जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं उन्हें फलाहार करना चाहिए।






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