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दैनिक यूपी ब्यूरो
07/03/2019  :  09:06 HH:MM
स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगनाओं की दहाड
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10 मई 1857 मेरठ छावनी में सैनिकों के आक्रोश से उत्पन्न संघर्ष भारतीय इतिहास में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से उल्लिखित है , जिसमें शीघ्र ही ब्रिटिश शासकों की शोषणकारी नीतिओं और दमनात्मक कार्यवाही से पीडि़त शासक व विशाल जन समूह व्यापक स्तर पर शामिल हो गया। यद्दपि यह संग्राम गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूसों को मुँह से खोलने की घटना को लेकर शुरू हुआ परंतु इसका मूल कारण ब्रिटिश सरकार और उसके कारिन्दों द्वारा वर्षों से सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्तर पर की गई ज्यादतियां थी जिनसे छुटकारा पाने के लिए भारतीयों द्वारा वृहद स्तर पर सशक्त कार्यवाही की गई।

अंग्रेज़ो से आजादी प्राप्त करने के इस युद्ध मे असंख्य पुरूषों के साथ साथ महिलाओं ने अपने प्राण न्योछावर करके देशप्रेम और पराक्रम का परिचय दिया। इस महासंग्राम में शासक वर्ग की नारियों ,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल एवं अवन्तिबाई के शौर्य व पराक्रम के साथ साथ सामान्य वर्ग की भटियारिनो, तवायफों का योगदान भी शामिल था जिन्होंने सूचनाओं के आदान प्रदान के साथ आर्थिक सहायता व क्रांतिकारियों को संरक्षण भी प्रदान किया । परंतु इस संघर्ष के 161 साल हो जाने के बाद भी बहुत सी ऐसी अनाम नारियां हैं जिनके त्याग और बलिदान से समाज आज भी अनभिज्ञ है। मेरे इस लेख में इन्हीं नारियों की शहादत को समाज के समक्ष उजागर करने का प्रयास किया गया है। 1857 के संघर्ष का आरंभ चर्बी वाले कारतूसों के कारण प्रारम्भ हुआ। इन कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी प्रयुक्त होने की जानकारी ब्रिटिश अधिकारियों के घरों में काम करने वाली लज्जो ने अपने पति मातादीन को दी थी, जिसने सैनिकों में ये सूचना संप्रेषित की। इसी चिंगारी ने क्रांति को जन्म दिया। 9 मई 1857 को विद्रोही सैनिकों को दंडित करने में शामिल ब्रिटिश शासकों के वफादार सैनिकों की भर्त्सना करने वाली उनकी माँ, पत्नी व बहने ही थी। जिसका उन पर इतना मनोनैतिक प्रभाव पड़ा कि उन्होंने संग्राम आरम्भ की तिथि की प्रतीक्षा किये बिना 10 मई 1857 को विद्रोह कर दिया। जिसने कालक्रम में व्यापक और प्रचण्ड रूप धारण कर लिया। इस तरह इस महासंग्राम को आरम्भ करने में नारियों की विशेष भूमिका थी। विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पर अधिकार करके बहादुरशाह जफर से नेतृत्त्व का आह्वान किया। बहादुर शाह जफर अपनी वृद्धावस्था और गीत ,संगीत में तल्लीन रहने के कारण उनकी सरपरस्ती करने के लिए तैयार नही हुए ऐसी विपरीत परिस्थितियों में उनकी बेगम जीनत महल ने ही क्रांतिकारियो का समर्थन करके उनका उत्साह वर्धन किया और बहादुर शाह को मुग़ल स्वाभिमान का वास्ता देते हुए नेतृत्व के लिये तैयार किया। कानपुर में  विद्रोहियों का नेतृत्व नाना साहब ने किया। उनकी पालिता पुत्री मैनादेवी को क्रांति की ज्वाला में जिंदा जला दिया गया। बेगम हजरत महल कविता, संगीत, नृत्य गान में संलग्न रहने वाले अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की बुद्धिमती पत्नी थी। वह एक कुशल नेतृत्व कर्त्री थी। नवाब वाजिद अली शाह 1854 से ही कलकत्ता में नजरबंद थे। अवध का शासन कंपनी के पास था। इन परिस्थितियो में बेगम हजरत महल ने फैज़ाबाद के मौलवी अहमद शाह के सहयोग से स्त्रियों की ‘मुक्ति सेना’ का गठन किया तथा उसे सैनिकोचित प्रशिक्षण प्रदान किया। 5 जुलाई 1857 को वह सशस्त्र छापामार संघर्ष करती थी तथा कलकत्ता में ‘महाकाली पाठशाला’ भी खोली। क्रिस्टोफर हिबर्ट की पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूयुटिनी’ तथा अमृतलाल नागर की रचना ‘गदर के फूल में’ लखनऊ के सिकन्दर बाग में पुरुष वेश में ब्रिटिश सेना पर जंगली बिल्लियों के समान झपटकर वार करने वाली महिलाओं की टुकड़ी का उल्लेख किया गया है। जिसकी नायिका उदा देवी थी।

ब्रिटिश सेना के खिलाफ असाधारण शौर्य का परिचय देते हुए एक पीपल के पेड़ के ऊपर छिपकर अकेले ही 36 अंग्रेजो को मार गिराया था। अंत मे कैह्रश्वटन डासन के द्वारा गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। बाद में उसे स्त्री जानकर दुखी होते हुए वहीं दफना दिया गया। आज भी सिकन्दर बाग चौराहे पर उदा देवी की प्रतिमा देखी जा सकती है। 1857 के महासमर में तवायफों और सरायवालियों के योगदान को नकारा नही जा सकता। तवायफें प्राचीन तहजीब और ललित कलाओं की को लखनऊ में बेगम ने ब्रिटिश सेना को पराजित किया तथा अपने पुत्र बिरजिस कद्र को शासक घोषित करके स्वयं शासन संभाला। कालांतर में वजीरे आलम बाल कृष्ण राव की हत्या और अहमदशाह के घायल हो जाने से नारी सेना भी कमजोर हो गयी और 21 मार्च 1858 तक लखनऊ पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया और बेगम नेपाल चली गयी और वहाँ के शासक से गुजारा भत्ता प्राप्त करके जीवन यापन करने लगी थी। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की नायिका झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से सभी परिचित हैं जिन्होंने रणभूमि में ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। रानी ने दुर्गा दल नामक महिलाओं की अलग सेना तैयार की तथा इसे झलकारी बाई के नेतृत्व में समुचित सैन्य प्रशिक्षण प्रदान किया। झलकारी बाई का रूप ,रंग और सैन्य कुशलता लक्ष्मीबाई के समान थी।

पोषक और संरक्षक हुआ करती थी। कोठों पर फिरंगी और क्रन्तिकारी सैनिक दोनों आते थे।फिरंगी अक्सर अपनी कार्ययोजना यहीं आकर बनाया करते थे। उनकी योजनाओं को देशप्रेम का परिचय देते हुए लखनऊ की हैदरीबाई क्रांतिकारियों तक पहुंचाती थी । बाद में ये रहीमी
की अगुवाई में बेगम हजरत महल द्वारा संगठित नारी सेना दल में शामिल हो गई। रुडयार्ड किपलिंग की कृति आन द सिटी वाल में क्रांति के दौरान तवायफ़ों का ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का उल्लेख मिलता है। कानपुर की नर्तकी अजीजन ने क्रान्तिकाल में विलासी जीवन त्याग कर क्रांतिवीरों का सहयोग करने के लिए स्वयं रणक्षेत्र में कूद पड़ी। वह सैनिकों को अंग्रेजों की सूचनाएं पहुँचाने के साथ घायल सैनिकों के लिए दवा,भोजन आदि की व्यवस्था भी करती थी। नारियों को सैनिक प्रशिक्षण देकर मस्तानी मंडली बनाई और पुरुष वेश में युद्ध भूमि में जाकर शत्रु संहार भी करती थी। समयांतर में वह फिरंगियों की गिरफ्त में आ गयी और कैह्रश्वटन हैवलॉक ने उसके रूप सौंदर्य से प्रभावित होकर उसे अपनी सेवा में रखना चाहा परन्तु इस देशाभिमानी नारी द्वारा अस्वीकार किये जाने पर उसे गोली मारकर मृत्युदण्ड दिया गया। भारत भूमि जहां रणबाकुरों के ओज से उर्वर है वहीं वीरांगनाओं के शौर्य,साहस और पराक्रम और बलिदान से भी समृद्ध है। 1857 में अंग्रेजों द्वारा किये गए शोषण से मुक्ति पाने का पहली बार व्यापक स्तर पर प्रयास किया गया । जिसमे हजारों स्त्रियों ने अपने प्राणों और प्राणप्रियों के प्राणों की आहुति दी ।






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