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दैनिक यूपी ब्यूरो
28/05/2018  :  00:27 HH:MM
जब ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने कहा, मैं इस पद के योग्य नहीं
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ईश्वर चंद्र विद्यासागर की शैक्षणिक योग्यता के विषय में जानकर एक महाविद्यालय के प्राचार्य ने उन्हें अपने कॉलेज में व्याकरणाचार्य के पद पर नियुक्त करना चाहा। इस आशय का एक पत्र लिखकर उन्हें भेजा गया। विद्यासागर ने पत्र पढ़ा तो वह सोच में पड़ गए। इस पत्र के साथ वह एक बड़ी जिम्मेदारी के महत्व पर विचार करने लगे। हालांकि विद्यासागर इस पद के लिए हर दृष्टिकोण से योग्य थे। लेकिन उनकी नजर में कोई और व्याकरणाचार्य था।
पूर्ण विनम्रता के साथ उन्होंने लिखा, ‘महोदय, आपको व्याकरण पढ़ाने के लिए एक योग्य अध्यापक की आवश्यकता है। मगर मैं सोचता हूं कि व्याकरण के मामले में मैं उतना योग्य नहीं हूं, जितना कि आप समझते हैं। मुझसे अधिक विद्वान मेरे मित्र वाचस्पति जी हैं। अगर संभव हो तो इस पद पर आप उनकी नियुक्ति करें। क्योंकि मेरा इस पद पर आना वाचस्पति जी की योग्यता का अपमान होगा। आशा है आप मेरा मंतव्य समझते हुए मुझे क्षमा करेंगे।’

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का वह पत्र पढ़कर प्राचार्य उनके प्रति नतमस्तक हो गए और सोचने लगे कि किसी दूसरे को अपने से अधिक बड़ा और योग्य बताना हर किसी के बस की बात नहीं। विद्यासागर जी ने ऐसा कहा है तो अवश्य ही वाचस्पति जी में कुछ बात होगी। कॉलेज की प्रबंध समिति ने विद्यासागर के इस प्रस्ताव को मानकर वाचस्पति जी को नियुक्ति पत्र भेज दिया।

मित्र की नियुक्ति से विद्यासागर को अत्यंत प्रसन्नता हुई। मित्र को जब इस घटना का पता चला तो वह तुरंत विद्यासागर के पास पहुंचे और उन्हें हृदय से लगाते हुए बोले, ‘आप वास्तव में मित्र से बढ़कर हैं, आपके बड़प्पन और विशाल हृदय के सम्मुख मेरी योग्यता भी आज छोटी पड़ गई है।’ विद्यासागर ने सहजता से जवाब दिया, ‘मित्रवर, जो योग्य है उसे उसका स्थान अवश्य मिलना चाहिए।’






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