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दैनिक यूपी ब्यूरो
06/12/2017  :  10:58 HH:MM
चुनावी मौसम में काम करेगा शराबबंदी का शिगूफा!
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चुनावी मौसम में काम करेगा शराबबंदी का शिगूफा! महिला मतदाताओं को लुभाने की कवायद, राजस्व के डर से फैसले में हिचकिचाहट नई दिल्ली। अंजना पाराशर विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर एक बार फिर कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शराबबंदी का शिगूफा राजनीतिक दलों ने छेड़ दिया है। महिला मतदाताओं को लुभाने के नाम पर कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस शराबबंदी का राग छेड़ रही हैं जबकि छतीसगढ़ में भाजपा सरकार द्वारा समिति गठन करने के बाद अब कांग्रेस औऱ अजित जोगी की अगुवाई वाली जनता कांग्रेस इस मुद्दे को जोर शोर से उठा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के वक्त शुरू की जा रही कवायद का मतदाताओं पर कितना असर पड़ेगा कहना मुश्किल है। पहले इस तरह के प्रयोग ज्यादातर राज्यों में विफल ही साबित हुए हैं।


चुनावी मौसम में काम करेगा शराबबंदी का शिगूफा!
महिला मतदाताओं को लुभाने की कवायद, राजस्व के डर से फैसले में हिचकिचाहट
नई दिल्ली। अंजना पाराशर
विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर एक बार फिर कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शराबबंदी का शिगूफा राजनीतिक दलों ने छेड़ दिया है। महिला मतदाताओं को लुभाने के नाम पर कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस शराबबंदी का राग छेड़ रही हैं जबकि छतीसगढ़ में भाजपा सरकार द्वारा समिति गठन करने के बाद अब कांग्रेस औऱ अजित जोगी की अगुवाई वाली जनता कांग्रेस इस मुद्दे को जोर शोर से उठा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के वक्त शुरू की जा रही कवायद का मतदाताओं पर कितना असर पड़ेगा कहना मुश्किल है। पहले इस तरह के प्रयोग ज्यादातर राज्यों में विफल ही साबित हुए हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकारे सूबे के राजस्व का मोह छोड़ पाएंगी । राज्य सरकारों द्वारा गठित समिति ने भी राजस्व और पर्यटन की आड़ में शराबबंदी की सफलता को लेकर सवाल उठाए हैं।
गौरतलब है कि कर्नाटक चुनाव के पहले शराबबंदी का मुद्दा वहां चर्चा में है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इंकार के बावजूद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे पार्टी के चुनाव अभियान में शामिल करने और घोषणा पत्र में शामिल करने का राग छेड़ा है। लेकिन शराबबंदी करने वाले राज्यों में इसके विपरीत असर की रिपोर्ट के आधार पर सरकार शराबबंदी की संभावना को खारिज कर रही है।
 सरकार में शराबबंदी के विरोध कर रहे धड़े का मानना है कि जिन राज्यों ने ये प्रयोग किया उन्हें अपने अभियान में सफलता नहीं मिली। गुजरात में हर साल हजारों करोड़ रुपये की अवैध सरकार की बिक्री हो रही है। बिहार में नीतीश सरकार ने पूर्ण शराबबंदी की घोषणा की लेकिन वहां भी हर रोज अवैध शराब का जखीरा पकड़ा जा रहा है। पड़ोसी राज्यो में शराब पर प्रतिबंध नहीं होने से बड़े पैमाने पर चोरी छिपे धराब यहाँ लाई जा रही है।
कांग्रेस में भी शराबबंदी को लेकर एक राय नहीं है। पार्टी में शराबबंदी के सुझाव की मुखालफत कर रहे  वर्ग का मानना है कि राजस्व को नुकसान के साथ ही इसका सियासी फायदा भी नही होगा। पार्टी नेता केरल सहित अन्य राज्यो का  उदाहरण दे रहे हैं।
तर्क दिया जा रहा है कि केरल मे शराबबंदी करने वाली सरकार दोबारा सत्ता में नही आई। अगली सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्ण शराबबन्दी का फैसला वापस ले लिया। शराबबंदी का विरोध करने वालों का मानना है कि बिहार में भी ये सामाजिक मुद्दा भले ही बना ही ये बड़ा सियासी मुद्दा नहीं बन पाया।
दरअसल शराब की बिक्री पर प्रतिबंध का मुद्दा आज़ादी के बाद से ही प्रासंगिक रहा है। 1958 में तत्कालीन केंद्र सरकार पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध लागू करना चाहती थी। लेकिन विशेषज्ञों की राय पर भारी राजस्व हानि की आशंका को देखते हुए सरकार फैसला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
1994 में जब देश उदारीकरण की राह पर था  आंध्रप्रदेश ने पूर्ण शराबबंदी लागू करने का फैसला किया। हरियाणा ने भी 1996 में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी। वंशीलाल ने अपने चुनाव में शराबबंदी को बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन दोनों राज्यों ने लगातार 1997 और 1998 में पूर्ण शराबबंदी के फैसला वापस ले लिया। वर्ष 2014 में आंध्रप्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के जगन रेड्डी ने शराबबंदी को मुद्दा बनाने का प्रयास किया लेकिन उनकी पार्टी चुनाव नहीं जीत पाई। राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर का कहना है कि शराबबंदी से राजनीतिक दलों को वोट मिलते हों इस तरह के प्रमाण नहीं मिलते हैं। ये आमतौर पर महिलाओं और खासकर ग्रामीण महिलाओं को लुभाने की कवायद के रूप में देखा जाता है लेकिन इसके नतीजे मिले जुले हैं।
कर्नाटक के साथ कई अन्य राज्यो छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अब एक बार फिर शराबबंदी राजनीतिक दलों के एजेंडे पर नजर आ रहा है। लेकिन इसपर राय बंटी होने की वजह से अभी ये तय नहीं है कि वाकई में शराबबंदी की दिशा में सरकारें अपना कदम कितना आगे ले जा पाएंगी।
स्वतंत्र रूप से जितने भी अध्ययन किये गए हैं उनमें पाया गया है कि शराब की बिक्री पर प्रतिबंध कभी भी आर्थिक रूप से व्यवहारिक फैसला नहीं रहा है। बल्कि शराबबंदी होने के बाद अवैध तरीके से शराब बनाने और इसकी अवैध बिक्री बढ़ जाती है। 
शराब कमोवेश सभी राज्यों के लिये राजस्व का बड़ा स्रोत रहा है। इससे पर्यटन उद्योग भी फलता फूलता है।
तमिलनाडु में वर्ष 2015 में करीब 29 हजार करोड़ रुपये राजस्व अकेले शराब से आया। बिहार में ये अपेक्षाकृत कम था। यहाँ वर्ष 2014-15 में करीब 3400 करोड़ रुपये राजस्व शराब से आया। केरल में करीब 96000 करोड़ राजस्व शराब से मिलने की बात आंकड़ों में दर्ज है। राज्यों में कुल राजस्व का 20 से 22 फीसदी तक शराब से आता रहा है।
उहापोह क्यों?
 - सियासी नहीं सामाजिक मुद्दा
- राजस्व और पर्यटन को नुकसान
- जहां शराबबंदी हुई वहां चोरी छिपे शराब का व्यापार औऱ भ्रष्टाचार बढ़ा। 
- शराबबंदी करने वाली सरकार कई जगहों पर दोबारा जीतकर नहीं आई।
- कई जगहों पर परंपरा के रूप में स्वीकार्य मसलन छतीसगढ़ के आदिवासी समाज में शराब परम्परा के रूप में विराजमान है।






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