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दैनिक यूपी ब्यूरो
10/11/2017  :  23:59 HH:MM
प्रद्युम्न हत्याकांड: क्या सीबीआई गढ़ रही है कहानी?
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क्या सीबीआई गढ़ रही है कहानी? आरुषि जैसा न हो प्रद्युम्न हत्याकांड की जांच का हश्र दैनिक यूपी का सटीक विश्लेषण देश को हिला देने वाले प्रद्युम्न हत्याकांड में सीबीआई जांच के शुरुआती निष्कर्ष ने सबको चौंका दिया है। सारा गणित उलट पुलट। हरियाणा पुलिस की एसआईटी की जांच फेल हुई या सीबीआई जांच ने मामले को उलझा दिया कहना मुश्किल है। लेकिन हमें मानकर चलना चाहिए कि हत्याकांड की गुत्थी सुलझना इतना आसान नही है।

क्या सीबीआई गढ़ रही है कहानी?
आरुषि जैसा न हो प्रद्युम्न हत्याकांड की जांच का हश्र
दैनिक यूपी का सटीक विश्लेषण
देश को हिला देने वाले प्रद्युम्न हत्याकांड में सीबीआई जांच के शुरुआती निष्कर्ष ने सबको चौंका दिया है। सारा गणित उलट पुलट। हरियाणा पुलिस की एसआईटी की जांच फेल हुई या सीबीआई जांच ने मामले को उलझा दिया कहना मुश्किल है। लेकिन हमें मानकर चलना चाहिए कि हत्याकांड की गुत्थी सुलझना इतना आसान नही है। इससे भी बड़ी बात हमें ये भी मानकर चलना चाहिए कि सीबीआई भगवान नहीं है। आरुषि मामले में सीबीआई जांच की क्या गति हुई सबके सामने है। आज किसी को नही पता कि आरुषि को आखिर किसने मारा। शायद अब पता भी नही चलेगा। आरुषि की आत्मा इस पूरे सिस्टम को कोस रही होगी। वो जानती है कि उसका हत्यारा कौन है लेकिन इस दुनिया को कैसे बताए। क्योंकि उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हो चुका है। आत्मा दूसरों से संवाद नही करती । वो चाहती होगी कि बाहर आये। हत्यारों की पहचान करे और बेनकाब करे इस सिस्टम को जो कहानियां गढ़ता है। कहानियों के लिए सबूत गढ़ता है। फिर अदालतों के सामने बेबस खड़ा हो जाता है कि बस यही हमारी सीमा है। मानना है तो इन्ही कहानियों को मानो वरना हमारा क्या जाएगा।
सबूतों के गढ़ने,अदालतों में फेल होने। निर्दोष लोगों के जेल जाने और सालों दूसरे के किये हुए की सजा भुगतकर बाहर आने। अंतहीन मामले हैं जिनकी चर्चा की जा सकती है। कभी पुलिस खुद की खाल बचाने के लिए तो कभी अन्य एजेंसिया अपनी साख के लिए किस स्तर तक चली जाती हैं अनेकों उदाहरण हैं। सत्ता के अभिमान के लिए बेईमान हो जाना तो आम बात है। लेकिन हर बार ऐसा नही होता। बहुत से मौके होते हैं जब इसी व्यवस्था से दोषी पकड़े जाते हैं। उनको उनके किये की सजा मिलती है। न्यायपूर्ण फैसले करके अदालतें गलतियों को सुधरती हैं। यानी उम्मीद कायम रहनी चाहिए। और इसी उम्मीद के आधार पर हम ये आशा कर सकते हैं कि प्रद्युम्न का हत्यारा भी पकड़ में आएगा। वास्तविक हत्यारा। रेयान स्कूल के जिस छात्र को प्रद्युम्न की हत्या की जुर्म में पकड़ा गया है वही वास्तविक हत्यारा है ये भरोसा सीबीआई को तथ्यों से देना होगा। क्योंकि लोगों के मन मे कई स्वाभाविक सवाल हैं कि सुबह सुबह अगर स्कूल में वारदात को आरोपी छात्र ने अंजाम दिया था तो उसपर पुलिस को शक क्यों नही हुआ। स्कूल प्रशासन को इसकी भनक कैसे नही लगी जबकि वारदात के बाद भी छात्र स्कूल में ही मौजूद था। क्या उसके कपड़े पर किसी तरह का दाग या धब्बा था। क्या वो घटना के बाद घबराया हुआ जुर्म छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा था। आखिर कंडक्टर हरियाणा पुलिस की कहानी में कैसे आया अगर सीसीटीवी फुटेज में केवल आरोपी छात्र नजर आ रहा था। 
बताया जा रहा है छात्र की मनोदशा ठीक नही थी। उसका इलाज भी चल रहा था। वह परीक्षा और पीटीएम टलवाना चाहता था इसलिए उसने वारदात को अंजाम दिया। अगर ऐसा था तो क्या इसकी जानकारी स्कूल को थी या इस तरह की मेडिकल रिपोर्ट सीबीआई को हाथ लगी। हां तो ये सारे तथ्य सामने रखे जाने चाहिए। सरसरी तौर पर ये मानना मुश्किल ही नही नामुमकिन सा लगता है कि परीक्षा टलवाने के लिए कोई छात्र इस तरह का संगीन जुर्म कर बैठे। लोगों के सवाल इसलिए हैं कि हत्या की सही वजह सामने आनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नही कि अभी भी कुछ छिपाने की कोशिश हो रही है।
स्कूल बड़ा है। प्रबंधन प्रभावशाली है। उनके संपर्क भी छोटे मोटे नही हैं। इसलिए बहुत लोगों को ये आशंका हो सकती है कि कहानियां गढ़कर, रहस्य और विरोधाभास की दीवार खड़ी करके कही ये कोशिश हो रही हो कि कोर्ट में कोई भी दोषी साबित न हो। इस केस का अंत आरुषि मामले की तरह नहीं हो इसके लिए ठोस और विश्वसनीय जांच की जरूरत है। अन्यथा लोगों के भरोसे को गहरी ठेस पहुंचेगी। सीबीआई को सच बताना होगा। कल्पनाओं से उबरकर वैज्ञानिक तरीके से सबूतों को प्रमाणित करने की जरूरत है। हरियाणा पुलिस को भी बताना होगा कि उसने किस आधार पर कंडक्टर को जेल में डाला। क्या वजह थी कि उन्हें किसी और पर कोई शक नही हुआ। कानून के अमल की जिम्मेदारी जिनपर है उनकी जवाबदेही भी होना चाहिए। भले ही इसके लिए पुलिस जांच में शामिल लोगों से ही पूंछताछ करनी पड़े।






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