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दैनिक यूपी ब्यूरो
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निर्मम सत्ता: बाप बेटे की कलह में कहाँ खोया समाजवाद
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सत्ता बहुत ही निर्मम होती है। सारे रिश्ते गौड़ हो जाते हैं अगर सामने सत्ता का सिंहासन नजर आ रहा हो। जिस पिता ने बेटे को बड़े शान से गद्दी पर बैठाया उसे ही पार्टी से बाहर निकालना पड़ा।

निर्मम सत्ता: कलह में डूबा समाजवाद
अंजना पाराशर

सत्ता बहुत ही निर्मम होती है। सारे रिश्ते गौड़ हो जाते हैं अगर सामने सत्ता का सिंहासन नजर आ रहा हो। जिस पिता ने बेटे को बड़े शान से गद्दी पर बैठाया उसे ही पार्टी से बाहर निकालना पड़ा। जिस बेटे ने कभी पिता की किसी भी बात पर न नहीं बोला आज वो सार्वजनिक रूप से पिता की राजनीतिक साख को बर्बाद कर रहा है। कौन सही है कौन गलत इसके अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन इतना साफ़ है कि मुलायम की कमजोर होती पकड़ ने स्थिति बिगाड़ दी है। अब अगर उन्हें फिर से खोई साख हासिल करनी है तो बेटे को ही सहारा बनाना पड़ेगा। क्योंकि जिस बेटे को उन्होंने ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया आज वो राजनीति के सुविधावादी सम्बन्धों के लिहाज से कई दलों के दिल के करीब है। जो मुलायम दलों को जोड़ने का काम करते थे। राष्ट्रीय स्तर पर जिनकी साख थी आज वे अपनों के चलते कमजोर पड़ गए हैं।
ये सच है कि मुलायम की जो राजनीतिक हैसियत रही है अखिलेश अभी उसके आसपास भी नही हैं। लेकिन ये भी सच है कि ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें अब लगता है कि भविष्य में समाजवादी पार्टी का अगर कोई चेहरा मुलायम के आसपास पहुँच सकता है तो वे अखिलेश ही हैं।
लेकिन अच्छा होता कि मुलायम के भरोसे के साथ अखिलेश आगे बढ़ते। अच्छा होता कि मुलायम सबकी सीमाएं तय कर देते। शिवपाल की छवि आम लोगों में अखिलेश के मुकाबले कहीं नहीं टिकती ये एहसास भी नेता जी को होना चाहिए था। 
जिस व्यक्ति ने राममनोहर लोहिया, चरण सिंह की पाठशाला से राजनीति का ककहरा पढ़ा हो उससे एक के बाद एक चूक क्यों हुई। क्यों उनपर कुछ लोगों ने कब्जा जमा लिया। क्यों अमर सिंह पुत्र की कीमत पर पार्टी में बने रहे। क्यों पार्टी के आम मानस की चिंता किये बिना मुलायम बेटे को बेइज्जत करते रहे। शायद इन सभी सवालों का जवाब उनके परिवार में ही छिपा है। कोई अदृश्य चेहरा भी है जो मुलायम के बगल शिवपाल की शक्ल में बैठा था। समय पर कई सवालों के जवाब मिलेंगे। लेकिन इतना साफ़ है कि जो भी देश के सबसे बड़े सूबे में हुआ है वो समाजवाद का कोई भी रूप नहीं हो सकता। मुलायम ने जनरेशन शिफ्ट का मर्म समझने में चूक कर दी। और इतिहास का एक ऐसा पन्ना उन्होंने अपने जीते जी लिख दिया जिसकी मिसाल आजाद भारत में तो नहीं ही मिलेगी।






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